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सुप्रसिद्ध मैनपुरी षड्यंत्र काण्ड

13 अक्टूबर

अंग्रेजों के अत्याचारों एवं घोर दमन नीति के कारण भारत वर्ष में भीषण असंतोष के बादल मंडराने लगे थे। नौजवानों का रक्त विदेशी सत्ता के विरुद्ध खौलने लगा था। उनमें विदेशी शासन के उन्मूलन का जोश उमड़ रहा था। उ.प्र. इसका अपवाद नहीं रहा। उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व बनारस में रहने वाले बंगाली क्रांतिकारियों ने किया था। उनकी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश में बहुत से देशभक्त किशोर आकर्षित हुए। मैनपुरी भी इस आग से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। 1915-16 के वाराणसी षडयंत्र केस के रूप में इसका विस्फोट हुआ। अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने के लिए मैनपुरी में भी एक संस्था की स्थापना हुई जिसका प्रमुख केन्द्र मैनपुरी ही रहा। मैनपुरी षडयंत्र केस की विशेषता यह थी कि इसका नियोजन उत्तर प्रदेश के निवासियों ने ही किया था जिसे बाद में अंग्रेजों ने इसे मैनपुरी षडयंत्र केस की संज्ञा दी। गेंदालाल दीक्षित जैसे क्रांतिकारी ने मातृवेदी संस्था की स्थापना कर मैनपुरी षडयंत्र केस के माध्यम से अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का श्रीगणेश किया। यदि मैनपुरी के ही इस संस्था में शामिल देशद्रोही गद्दार दलपत सिंह ने अंग्रेजी सरकार को इसकी मुखबिरी न की होती तो चन्द्रशेखर आजाद की इलाहाबाद में हत्या नहीं हुई होती। मैनपुरी षड्यंत्र केस भारत वर्ष की आजादी का इतिहास का एक ऐसा सुनहरा पृष्ठ है कि जब-जब मैनपुरी के क्रांतिकारियों की याद की जाएगी, मैनपुरी षडयंत्र केस लोगों की जुबान पर अपने आप ही आ जाएगा।

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सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से सभी महान क्रांतिकारियों को शत शत नमन !

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