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Category Archives: साइंस

अब सभी समझ पाएंगे काग की भाषा!

पशु-पक्षियों की बोली में भी कोई न कोई संदेश छिपा होता है। प्राचीन काल में लोग पशु-पक्षियों की भाषा पर भविष्यवाणी करते थे जो सटीक बैठती थी। ऐसी ही एक हस्तलिखित पांडुलिपि शिमला के पांडुलिपि रिसोर्स सेंटर को मिली है जिसमें कौव्वे की कांव-कांव का रहस्य छिपा है।

टांकरी लिपि में करीब दो सौ पृष्ठ के इस ग्रंथ का नाम है ‘काग भाषा’। यदि रिसोर्स सेंटर इसका अनुवाद करवाता है तो छिपे रहस्य का भी पता चल सकेगा।

तीन सौ साल पुराना, दो सौ पन्नों का यह ग्रंथ शिमला जिले से मिला है जिसमें कौव्वे की बोली से संबंधित जानकारी है। शाम, सुबह या दोपहर को कौव्वे की कांव-कांव का अर्थ क्या होता है,पुस्तक में यह जानकारी है। कौव्वा किस घर के किस दिशा में बैठा है, किस दिशा में मुंह है। इन रहस्यों से पर्दा इसके अनुवाद के बाद ही उठेगा।

रिसोर्स सेंटर में सैकड़ों साल पुराने रजवाड़ाशाही का इतिहास के अलावा आयुर्वेद, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र और यंत्र के अलावा धार्मिक ग्रंथ भी शामिल हैं। यह पांडुलिपियां विभिन्न भाषाओं मसलन पाउची, फारसी, पंडवाणी, चंदवाणी, ब्रह्माी, शारदा, भोटी, भटाक्षरी, संस्कृत, टांकरी, देवनागरी आदि लिपियों में हैं। केंद्रीय पांडुलिपि मिशन ने हिमाचल रिसोर्स सेंटर को पांडुलिपि तलाश अभियान में अव्वल माना है।

सैकड़ों साल पहले जब पुस्तक प्रकाशित करने के संसाधन कम थे तो लोग हाथों से लिखा करते थे। इसमें धार्मिक साहित्य के अलावा ज्योतिष, आयुर्वेद, नाड़ी शास्त्र, तंत्र-मंत्र-यंत्र, इतिहास, काल और घटनाएं होती थी। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने देश में बिखरी इन दुर्लभ पांडुलिपियों को एकत्रित करने के लिए राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन की शुरूआत की। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के तहत हिमाचल भाषा, संस्कृति एवं कला अकादमी को 2005 में रिसोर्स सेंटर घोषित किया गया है।

रिसोर्स सेंटर का कार्य हिमाचल में पांडुलिपियों को ढूंढ़ना, उन्हें संरक्षित करना तथा उसमें छिपे रहस्य को जनता के सामने लाना था। रिसोर्स सेंटर को अभी तक प्रदेश के विभिन्न कोने से 44,642 पांडुलिपियां मिली हैं जो अब ऑनलाइन हैं जबकि 600 के करीब पांडुलिपियां रिसोर्स सेंटर में हैं।

गौरतलब है कि इस भाषा के ज्ञाता बहुत कम ही रह गए हैं। इसलिए रिसोर्स सेंटर ने इसके लिए गुरु-शिष्य परंपरा भी शुरू की है। अधिकतर पांडुलिपियां तंत्र-मंत्र, आयुर्वेद, ज्योतिष, इतिहास और धर्मग्रंथ से संबंधित पुस्तकें मिल रही हैं।

रिसोर्स सेंटर का कहना है कि सबसे अधिक पांडुलिपियां लाहुल-स्पीति में मिल रही हैं। वहां अभी 3038 पांडुलिपियों का पता चला है। यहां मोनेस्ट्री से संबंधित दस्तावेज ज्यादा हैं। अभी तक टांकरी लिपि में पांच शिष्य गुरु हरिकृष्ण मुरारी से यह लिपि सीख रहे हैं। यह सेंटर कांगड़ा के शाहपुर में खोला गया है। केंद्र सरकार से सिरमौर में पाउची लिपि सिखाने के लिए सेंटर खोलने की अनुमति मिल चुकी है।

पांडुलिपि रिसोर्स सेंटर के कोर्डिनेटर बीआर जसवाल कहते हैं कि कुछ पांडुलिपियों का अनुवाद किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हिमाचल के कोने-कोने में प्राचीन पांडुलिपियां पड़ी हैं, जिनमें अकूत ज्ञान का भंडार छुपा है। पांडुलिपि के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए समय-समय पर सेमीनार गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है।

पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए अलग से सेंटर भी स्थापित किया गया है जहां इन पर केमिकल लगाकर इन्हें संरक्षित किया जाता है। पांडुलिपियों को उपचारात्मक और सुरक्षात्मक उपाय किए जाते हैं। धुएं, फंगस, कीटों का असर नहीं रहता। इसके लिए पैराडाइ क्लोरोवैंजीन, थाइमोल, ऐसीटोन, मीथेन आयल, बेरीक हाइड्राओक्साइड, अमोनिया आदि रसायनों का प्रयोग कर संरक्षित किया जाता है।

खजाने में क्या-क्या है ?

हिमाचल संस्कृति एवं भाषा अकादमी में अब तक जो पांडुलिपियां मिली हैं उनमें प्रमुख कांगड़ा में 600 साल पुराना आयुर्वेद से संबंधित कराड़ा सूत्र है जो भोटी लिपि में लिखा गया है। इसके अलावा कहलूर-हंडूर, बिलासपुर-नालागढ़, सिरमौर रियासत का इतिहास [उर्दू], कटोच वंश का इतिहास, कनावार जिसमें किन्नौर का इतिहास, राजघराने, नूरपूर पठानिया, पठानिया वंश का इतिहास, बृजभाषा में रसविलास, सिरमौर सांचा [पाउची में], रामपुर के ढलोग से मंत्र-तंत्र, राजगढ़ से 300 साला पुराना इतिहास, 12वीं शताब्दी में राजस्थान के पंडित रानी के दहेज में आए थे उनके ग्रंथ भी मिले हैं जो पाउची में हैं।

पांगी में चस्क भटोरी नामक एक पांडुलिपि ऐसी मिली हैं जिसका वजन 18 किलो बताया जा रहा है। एक अन्य पांडुलिपि लाहुल-स्पीति में भोटी भाषा में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। जपुजी साहब, महाभारत, आयुर्वेद, स्कंद पुराण, कुर्सीनामा, राजाओं के वनाधिकार, कुरान तक की प्राचीन पांडुलिपियां मिली हैं।

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शराब और तंबाकू के नशे के बाद अब इंटरनेट फीवर की गिरफ्त में दुनिया

शराब और तंबाकू के नशे के बाद अब एक नए नशे ने दुनिया को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। यह नशा है ‘इंटरनेट का नशा’। अगर आप चाह कर भी स्वयं को सोशल नेटवर्किंग साइट्स, वीडियो गेम और चैटिंग जैसी गतिविधियों में लिप्त होने से दूर नहीं रख पा रहे हैं, तो आप भी इंटरनेट ‘फीवर’ की गिरफ्त में आ चुके हैं।
अमेरिका के सिएटल में पिछले दिनों लोगों की इंटरनेट की ‘लत’ छुड़ाने के लिए एक ‘तकनीकी पुनर्वास केंद्र’ की शुरूआत की गई है। इस पुनर्वास केंद्र में इंटरनेट की लत से पीड़ित लोगों को इसका नशा छोड़ने में मदद करने के लिए थेरेपी का उपयोग किया जा रहा है। पुनर्वास केंद्र में वीडियो गेम, मोबाइल गेम, सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स और चैटिंग की आदत से परेशान लोगों को उपचार मुहैया कराया जा रहा है।
45 दिवसीय थेरेपी के लिए केंद्र में 19 वर्ष के एक युवा ने स्वयं को पंजीकृत भी करा लिया है। अपने देश के नागरिकों को इस अनूठी बीमारी से निजात दिलाने की कोशिश कर रहे अमेरिका की इस पहल के बाद भारतीय विशेषज्ञों का भी मानना है कि ऐसे पुनर्वास केंद्र की अब भारत में भी जरूरत है। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डा. समीर पारेख कहते हैं कि इंटरनेट का बहुत ज्यादा इस्तेमाल धीरे-धीरे अन्य नशों की तरह व्यक्ति को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। पुनर्वास केंद्र ऐसे नशे को दूर करने में उपयोगी साबित हो सकता है।
डा. पारेख ने कहा कि मेरे पास कई ऐसे युवा उपचार के लिए आए हैं, जिन्हें इंटरनेट के उपयोग की लत लग गई थी। कई युवाओं को उनके अभिभावक ऐसी शिकायत के चलते लेकर आए थे। डा. पारेख का कहना है कि भारत में कई अभिभावक जागरूक होकर अपने बच्चों की इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। प्रैक्टिसिंग साइकोलॉजिस्ट के तौर पर अमेरिका समेत कई देशों के निवासियों की मानसिक समस्याओं को आनलाइन सुलझाने वाले मनोवैज्ञानिक और भोपाल के प्रतिष्ठित भोपाल स्कूल ऑफ सोशल साइंस के प्राध्यापक डा. विनय मिश्रा ने कहा कि युवाओं में इंटरनेट के नशे की प्रवृत्ति भारत में भी बढ़ती जा रही है।
डा. मिश्रा ने उनके पास आए एक मामले के आधार पर कहा कि भोपाल के एक कालेज में पढ़ रही एक लड़की ने इंटरनेट की सुविधा उठाने के लिए अपने माता-पिता को घर के बरामदे में रहने पर मजबूर कर दिया। लड़की चाहती थी कि इंटरनेट पर चैटिंग करते समय उसे कोई परेशान न करे। उन्होंने बताया कि लड़की की इस हरकत का माता-पिता द्वारा प्रतिकार करने पर उसने अपने अभिभावकों को मारना-पीटना शुरू कर दिया। इससे परेशान होकर उसके माता-पिता ने मनोवैज्ञानिक की शरण ली, लंबे उपचार और काउंसलिंग के बाद लड़की की मानसिक स्थिति में सुधार आ सका।
मिश्र ने बताया कि कई बार लोग इंटरनेट का उपयोग मौज-मस्ती के लिए शुरू करते हैं, जो बाद में नशे का रूप ले लेता है। अगर बच्चा घंटों तक बेवजह इंटरनेट से चिपका रहे, तो उसे इसका नशा लगने की पूरी आशंका होती है। इस प्रवृत्ति को अगर विभिन्न उपायों से रोका न जाए तो यह घातक रूप ले सकता है।
इंटरनेट की आदत अब संबंधों में भी दरार डाल रही है। मुंबई में पिछले दिनों हुई एक घटना से तो कम से कम यही साबित होता है। मनोचिकित्सक डा. एसके टंडन ने मुंबई की एक अदालत में पहुंचे इस मामले के बारे में बताया कि इंटरनेट की आदत ने एक युवा दंपत्ति को तलाक के कगार पर पहुंचा दिया है। शादी के महज सात महीने के भीतर एक पति अपनी पत्नी की इंटरनेट पर चैटिंग करने की आदत से इतना परेशान हुआ कि उसे पत्नी से तलाक लेने के अलावा कोई चारा नहीं दिखा।

डा. टंडन ने बताया कि पति कमल मिश्र ने पत्नी संजना को कई बार समझाने का प्रयास किया, लेकिन उसकी आदत नहीं छूटी। वह हर रोज इंटरनेट कैफे पर जाकर घंटों चैटिंग करती थी।। इसके बाद कमल ने अपनी पत्नी को समझाने के लिए पहले मनोचिकित्सक का और न समझने पर वकील का सहारा लिया। अब कमल संजना से तलाक लेने में ही भलाई समझ रहे हैं।

 

बस बीस साल दूर है अमरत्व!

24sepct809-1_1253805316_mसदियों से इंसान की सबसे बड़ी ख्वाहिश, सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा अमर होने की रही है। यह अलग बात है कि तमाम कोशिशों के बावजूद ऐसा अभी तक संभव नहीं हो सका है लेकिन एक अमेरिकी वैज्ञानिक रे कुर्जवील ने दावा किया है कि नैनोटेक्नोलाजी की मदद से इंसान अगले 20 सालों में अमर हो सकता है। इसी नैनो तकनीक के चलते अगले दो दशकों में शारीरिक क्रियाविधि को लेकर हमारी समझ भी खासी बढ़ जाएगी।

61 वर्षीय रे ने भविष्य में काम आने वाली तकनीकों के बारे में कहा कि मैं और मेरे कई साथी वैज्ञानिकों का मानना है कि लगभग 20 सालों में हम पाषाण युग से चले आ रहे शरीर के प्रोग्राम को बदल देंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो नैनोटेक्नोलाजी की मदद से शरीर की मूलभूत क्रियाविधि बदली जा सकेगी। इससे उम्र का बढ़ना भी रुक जाएगा और तब हम बुढ़ापे पर विराम या जवानी को लौटा सकेंगे।’

कुर्जवील को आला दर्जे का भविष्यवादी करार देते हुए दुनिया के सबसे अमीर आदमी बिल गेट्स ने कहा, ‘हम मानवीय इतिहास के सबसे उत्कृष्ट काल में रहने जा रहे हैं। उस दौर में हम कंप्यूटर तकनीक और जींस को समझने में आज के मुकाबले कहीं ज्यादा सक्षम होंगे।’

आखिर कैसे सच होगा सपना:-

कुर्जवील के मुताबिक, ‘जानवरों में रक्तकणिकाओं के आकार की पनडुब्बियों का परीक्षण किया जा चुका है। इन पनडुब्बियों को नैनोबोट्स नाम दिया गया है। इन नैनोबोट्स का प्रयोग बिना आपरेशन किए ट्यूमर और थक्के को दूर करने में किया जाएगा। जल्द ही नैनोबोट्स रक्तकणिकाओं का स्थान ले लेंगी। यही नहीं रक्तकणिकाओं की तुलना में ये नैनोबोट्स हजार गुना ज्यादा प्रभावकारी होंगी।’

ला आफ एक्सेलेरेटिंग रिटंर्स पर आधारित इस अवधारणा में अगले 25 सालों में इंसान की तकनीकी क्षमता अरबों गुना बढ़ जाएगी। आप बिना सांस लिए 15 मिनट में मैराथन या चार घंटे तक स्कूबा डाइविंग कर सकेंगे।

क्या होगा तकनीक के दम से:-

कुर्वजील के मुताबिक ‘2150 तक हमारे पास शरीर व मस्तिष्क की सूचनाओं को जानने के लिए खासा बैकअप होगा। आप कह सकते हैं कि शरीर की कोई भी क्रियाविधि अनछुई नहीं रह जाएगी। जाहिर है सारी चीजें ज्ञात होने की स्थिति में इंसान अमर हो जाएगा।’

नैनो तकनीक के दम से इंसान के मस्तिष्क की क्षमता इतनी बढ़ जाएगी कि हम कुछ मिनटों में किताब लिख सकेंगे। रे के मुताबिक, ‘उस समय यदि आप वर्चुअल-रियलिटी [काल्पनिक सच्चाई] मोड में जाना चाहेंगे तो नैनोबोट्स मस्तिष्क को संदेश भेजना बंद कर देंगी। बस, इसके बाद तो आप कुछ भी कुछ सोचने के लिए स्वतंत्र हैं। मस्तिष्क में बनने वाले त्रिविमीय [3-डी] चित्रों से यह पता लगाया जा सकेगा कि वर्तमान में क्या हो रहा है।

 

महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक थे सतीश धवन (25/09/1920 – 03/01/2002)

देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाई पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने वाले महान वैज्ञानिक प्रो. सतीश धवन एक बेहतरीन इंसान और कुशल शिक्षक भी थे, जिन्हें भारतीय प्रतिभाओं पर अपार भरोसा था।
भारतीय प्रतिभाओं में उनके विश्वास को देखते हुए उनके साथ काम करने वाले लोगों तथा उनके छात्रों ने कठिन मेहनत की ताकि उनकी धारणा की पुष्टि हो सके। सतीश धवन को विक्रम साराभाई के बाद देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की जिम्मेदारी सौंपी गई था और वह इसरो के अध्यक्ष नियुक्त किए गए।
विक्रम साराभाई ने ऐसे भारत की परिकल्पना की थी जो उपग्रहों के निर्माण एवं प्रक्षेपण में सक्षम हो और नई प्रौद्योगिकी सहित अंतरिक्ष कार्यक्रम का पूरा फायदा उठा सके। सतीश धवन ने न सिर्फ उनकी परिकल्पना को साकार किया बल्कि भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाई देते हुए भारत को दुनिया के गिनेचुने देशों की सूची में शामिल कर दिया। वह एक बेहतरीन इंसान भी थे जिन्होंने कई लोगों को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम [इसरो] की वेबसाइट के अनुसार राकेट वैज्ञानिक सतीश धवन ने संस्था के अध्यक्ष के रूप में अपूर्व योगदान किया और उनके प्रयासों से भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में असाधारण प्रगति हुई तथा कई बेहतरीन उपलब्धियां हासिल हुई। वेबसाइट के अनुसार अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रमुख रहने के दौरान ही उन्होंने ‘बाउंड्री लेयर रिसर्च’ की दिशा में अहम योगदान किया, जिसका जिक्र दर्पन स्लिचटिंग की पुस्तक ‘बाउंड्री लेयर थ्योरी’ में किया गया है। सतीश धवन इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस, बेंगलूर के लोकप्रिय प्राध्यापक थे और उन्हें इस संस्थान में पहला सुपरसोनिक विंड टनेल स्थापित करने का श्रेय है। उनके प्रयासों से संचार उपग्रह इंसैट, दूरसंवेदी उपग्रह आईआरएस और ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी का सपना साकार हो सका और भारत चुनिंदा देशों की कतार में शामिल हो गया।
श्रीनगर में 25 सितंबर 1920 को जन्मे सतीश धवन ने इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस में कई सकारात्मक बदलाव किए। उन्होंने संस्थान में अपने देश के अलावा विदेशों से भी युवा प्रतिभाशाली फैकल्टी सदस्यों को शामिल किया। उन्होंने कई नए विभाग भी शुरू किए और छात्रों को विविध क्षेत्रों में शोध के लिए प्रेरित किया। तीन जनवरी 2002 को उनके निधन के बाद श्रीहरिकोटा स्थित उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र का नाम बदलकर प्रो. सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र कर दिया गया। उनके निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने शोक व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के शानदार विकास और उसकी ऊंचाई का काफी श्रेय प्रो. सतीश धवन के दूरदृष्टिपूर्ण नेतृत्व को जाता है।

भारत के इस महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक को सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से शत शत नमन |

 

चांद पर पानी मिलने के प्रमाण

वैज्ञानिकों ने गुरुवार को घोषणा की कि भारत के पहले चंद्र मिशन चंद्रयान-1 ने चांद की सतह पर पानी की मौजूदगी के प्रमाण खोज निकाले हैं। हांलाकि इसकी पुष्टि इसरो ने नहीं की है।
चंद्रयान-1 के साथ भेजे गए नासा के उपकरण ‘मून मिनरलोजी मैपर [एम-3]’ ने परावर्तित प्रकाश की तरंगदै‌र्ध्य [वेवलेंथ] का पता लगाया जो ऊपरी मिट्टी की पतली परत पर मौजूद सामग्री में हाइड्रोजन और आक्सीजन के बीच रासायनिक संबंध का संकेत देता है।
चंद्रयान-1 द्वारा जुटाए गए विवरण का विश्लेषण कर एम-3 ने चंद्रमा पर पानी के अस्तित्व की पुष्टि कर दी है। इस खोज ने चार दशक से चले आ रहे इन कयासों पर विराम लगा दिया है कि चंद्रमा पर पानी है या नहीं।

वैज्ञानिकों ने पहले दावा किया था कि चंद्रमा पर लगभग 40 साल पहले पानी का अस्तित्व था। यह दावा उन्होंने अपोलो अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा स्मृति के रूप में धरती पर लाए गए चंद्र चट्टानों के नमूनों के अध्ययन के बाद किया था, लेकिन उन्हें अपनी इस खोज पर संदेह भी था, क्योंकि जिन बक्सों में चंद्र चट्टानों के अंश लाए गए, उनमें रिसाव हो गया था। इस कारण ये नमूने वातावरण की वायु के संपर्क में आकार प्रदूषित हो गए थे।

 

अब तीखी मिर्च से बनेंगे ग्रेनेड

मिर्ची खाने वाले इस बात से बखूबी वाकिफ हैं कि मिर्च तीखी हो तो कान से धुंआ बनकर निकलती है, लेकिन क्या आपने कभी चिली ग्रेनेड के बारे में सुना है। देश के रक्षा वैज्ञानिक अब तीखी मिर्च से ग्रेनेड बनाने की तैयारी कर रहे हैं।

असम के तेजपुर स्थित डिफेंस रिसर्च लेबोरेटरी [डीआरएल] ने अनुसंधान के बाद निष्कर्ष निकाला है कि दुनिया की सबसे तीखी मिर्च ‘भूत जोलोकिया ‘ को ग्रेनेड में तब्दील किया जा सकता है और यह घातक भी नहीं होगा। भारतीय मिर्च की एक तेजतर्रार किस्म भूत जोलोकिया को नागा मिर्च भी कहा जाता है। यह अमेरिका को निर्यात की जाती है। यह वहां के लोगों के भोजन का एक प्रमुख हिस्सा है।

वर्ष 2007 में गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकार्ड ने भूत जोलोकिया को सर्वाधिक तीखी मिर्च घोषित किया था। इस मिर्च का करिश्मा यहीं तक नहीं है। डीआरएल के वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका पाउडर तैयार कर, उसे जानवरों को दूर भगाने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

डीआरएल के वैज्ञानिक तीखे स्वाद वाली इस मिर्च से ग्रेनेड बनाने की कोशिश में हैं। भीड़ को तितर-बितर करने और अन्य उद्देश्यों के लिए पुलिस और सेना इस ग्रेनेड का इस्तेमाल कर सकते हैं। डीआरएल के वैज्ञानिक आर पी श्रीवास्तव ने बताया कि ‘चिली ग्रेनेड’ की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि यह घातक प्रकृति का नहीं होगा। उन्होंने बताया कि भीड़ को नियंत्रित करना हो या चरमपंथियों को उनके ठिकाने से बाहर निकालना हो, चिली ग्रेनेड लक्ष्य को भौतिक रूप से कोई नुकसान पहुंचाए बिना, अपना काम कर लेगा।

डीआरडीओ और विश्व वन्यजीव कोष भी मिर्च से ऐसा पाउडर तैयार करने के लिए प्रयासरत हैं, जिसे जंगली हाथियों को दूर भगाने के लिए रस्सियों और बाड़ पर लगाया जा सके। पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में जंगली हाथी तबाही मचाते हैं।

इस सिलसिले में एक प्रायोगिक परियोजना पर काम चल रहा है। इसके लिए मजबूत वनस्पति रेशों से जूट की बाड़ तैयार कर उस पर भूत जोलोकिया का पाउडर छिड़क दिया गया ताकि जंगली हाथी इसके करीब न आ सकें। हाथियों को पास न फटकने देने के लिए इस मिर्च के इस्तेमाल से कुछ और प्रयोग भी किए गए जो सफल रहे हैं। अब असम सरकार मिर्च की खेती को बढ़ावा देने के लिए एक परियोजना पर काम कर रही है। भूत जोलोकिया मिर्च नगालैंड और असम की खासियत है।

राज्य के कृषि विभाग ने अपने वानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग को चयनित इलाकों में मिर्च की इस किस्म का उत्पादन करने का निर्देश दिया है। कृषि मंत्री प्रमिला रानी ब्रह्म ने बताया कि शुरू में मिर्च की खेती के लिए दो जिलों गोलाघाट और बक्सा को चुना गया है। उन्होंने बताया कि फिलहाल 300 हेक्टेयर भूमि में इस मिर्च की खेती की जाएगी जिससे अच्छा राजस्व मिलने की संभावना है।

भोजन में मसाले के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली मिर्च पेट की बीमारियां दूर करने में मददगार होती है। इसे हृदयघात के लिए भी अच्छा इलाज माना जाता है।