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Category Archives: सरकार की नीतियां

महंगी पड़ेगी चेक में चूक

चेक काटने जा रहे हैं, तो सावधान हो जाइए। अब चेक भरने में की गई मामूली चूक से भी यह बाउंस हो जाएगा। इसका आपको दोतरफा नुकसान उठाना होगा। इससे न केवल आपको उस बैंक को पेनाल्टी भरनी होगी जिसका चेक जारी किया जा रहा है, बल्कि उसे भी जिसके लिए चेक जारी किया जा रहा है। कहीं वह पार्टी जिसे चेक इश्यू किया गया है, कानूनी कार्रवाई पर उतर आई तो कोर्ट कचहरी के चक्कर से भी कोई नहीं बचा सकता।

भारतीय रिजर्व बैंक ने 22 फरवरी, 2010 को एक सर्कुलर जारी किया था। इसके मुताबिक यदि चेक में तारीख के अलावा कोई दूसरा बदलाव किया जाता है तो उस दशा में ग्राहकों को नया चेक इश्यू करना होगा। अब चाहे आपको चेक पर नाम में संशोधन करना हो या फिर इसमें भरी गई राशि में बदलाव करना हो। फिलहाल इन दिशानिर्देशों को लागू करने की कोई अंतिम तारीख तय नहीं की गई है, पर एचडीएफसी बैंक समेत कुछ बैंक इन्हें 1 जुलाई, 10 से लागू कर रहे हैं।

साफ है कि आरबीआई के इस सर्कुलर के नियमों को अगर अमली जामा पहनाया गया, तो निश्चित ही चेक बाउंस के मामले भी बढ़ेंगे। वैसे केंद्रीय बैंक का तर्क है कि नए नियमों से चेक में धोखाधड़ी के मामलों में गिरावट आएगी। चूंकि इन दिशानिर्देशों से बड़ी संख्या में ग्राहक प्रभावित होंगे, लिहाजा बैंकों ने इनकी जानकारी भी देनी शुरू कर दी है। एचडीएफसी बैंक ने कहा है कि वह जून, 2010 के अंत तक इस बारे में ग्राहकों को सूचित करता रहेगा। बैंकों ने इस जानकारी को अपने नोटिस बोर्ड पर भी चस्पा कर रखा है।

काउंटर साइन के संबंध में भी ये नियम लागू होंगे। आमतौर पर चेक इश्यू करने वाले व्यक्ति से चेक भरने में कोई गलती हो जाती है और वह उसे दोबारा हस्ताक्षर (काउंटर साइन) कर इश्यू कर देता है, तो बैंक उस चेक को क्लियर कर देते हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा।

अभी बैंक मामूली गलतियां होने पर चेक क्लियर कर देते हैं, पर आगे से इसकी गुंजायश बिल्कुल खत्म हो जाएगी। बैंकों का कहना है कि नए दिशा-निर्देशों के लागू होने के बाद कोई भी क्लीयरिंग शाखा यह जोखिम नहीं उठाएगी।

आरबीआई को वैसे तो नए नियमों से काफी उम्मीद है कि इससे चेक में हेराफेरी के मामलों में कमी आएगी, पर बैंकों के कुछ अधिकारियों को इसमें संदेह है। बैंक आफ इंडिया के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चेक में फेरबदल के कारण ही केवल हेराफेरी नहीं होती। कुछ लोग तो नकली चेक बना लेते हैं। उसके लिए क्या करेंगे? हालांकि केंद्रीय बैंक ने इसके लिए भी इंताजाम किया है। धोखाधड़ी रोकने के लिए बेहतर कागज, चेक में अदृश्य लोगो और वाटर मार्क जैसे अतिरिक्त सुरक्षा फीचर जोड़े जाएंगे। इस बारे में भी उसने सभी बैंकों को निर्देश फरवरी, 2010 में ही जारी कर दिए थे।

—इन बातों का रखें ख्याल—

1-न मिटाई जा सकने वाली स्याही का प्रयोग करें

2-दिन, महीने और साल को सटीक भरें

3-जिसे चेक काट रहे हों, उसका नाम सही लिखें

4-दी जाने वाली राशि को ध्यान से भरें

5-हस्ताक्षर करने में काट-पीट कतई न करें

 

हमले की बरसी पर बिखरे हिफाजत देने वाले हाथ !!

मुंबई को आतंक की बरसी पर यह नहीं चाहिए था। वह तो अपनी पुलिस में एकजुटता और मजबूती तलाश रही थी। लेकिन हमले से ठीक पहले उसकी पुलिस राजनीति में उलझ कर बिखर गई। मंगलवार को जब गोरेगाव के एसआरपीएफ ग्राउड में महाराष्ट्र पुलिस में एनएसजी की तर्ज पर बनी त्वरित कार्रवाई बल ‘फोर्स वन’ अपनी दमखम दिखा रही थी, मुंबई की जनता अपनी पुलिस की ताकत नहीं बल्कि पुलिस के बिखराव पर चर्चा कर रही थी। हो भी क्यों न, जहा पूर्व पुलिस कमिश्नर अब्दुल गफूर को पुलिस अधिकारियों के साहस पर शक हो और पिछले साल के हमले दौरान मराठी पुलिस व गैर मराठी पुलिस वालों की बहादुरी की तुलना हो रही हो, वहा फोर्स वन से जनता के भरोसे को फोर्स आखिर कैसे मिले।

मुंबई को मंगलवार से त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा मिल रहा है। लेकिन इस घेरे को बनाने वाले खुद ही अह, स्वार्थ और असमंजस से घिरे है। हालत यह है कि बरसी पर पुलिस को एकजुट करने के बजाय राज्य के गृहमंत्री आरआर पाटिल खुद गफूर के खिलाफ मुकदमे के लिए अधिकारियों को इजाजत देने के हामी है। यानी कि मोर्चे बंधने लगे है। गोरेगाव के एसआरपीएफ मैदान में आयोजन के दौरान इलीट पुलिस और आम पुलिस के बीच नजरिए का अंतर साफ देखा जा सकता था। आपसी ईष्र्या का आलम यह है कि फोर्स वन में नियुक्ति के मानदंडों तक पर सवाल उठ रहे है। साथ ही उनमें चयनित पुलिस वालों को मिल रहे प्रशिक्षण और सुविधाओं से मुंबई पुलिस के दूसरे अधिकारी और सिपाही क्षुब्ध है। गोरेगांव स्थित स्पेशल रिजर्व पुलिस बल में मंगलवार को आयोजित कार्यक्रम में डयूटी पर तैनात मुंबई पुलिस के जवान तो साफ कह रहे थे कि सबसे पहले मरना तो हमें है, लेकिन सुविधाएं और प्रशिक्षण कुछ खास लोगों को दिया जा रहा है।

मुंबई चलती रहती है मगर पिछले साल की याद कर लोग सहमे है। मुंबई में 18 साल से टैक्सी चला रहे दतिया के दिनेश शुक्ला हों या फिर मराठी मानुष अमित मोरे, दोनों ही एक बात पर राजी है कि आतंकी हमले करे तो रोकना मुश्किल होगा। पुलिस या सरकार पर इस कदर अविश्वास क्यों.? दिनेश शुक्ला कहते है कि राज ठाकरे के लंपट गुंडों को तो यह पुलिस रोक नहीं पाती, फिर भला एके-47 लिए आतंकियों से क्या निपटेगी। दूसरी तरफ अमित मोरे सीधे बाहरी यानी दूसरे प्रांतों से आए लोगों का मुद्दा उठाते है। वह कहते है कि कितने आतंकी या उनके हमदर्द यहां छिपे बैठे है। पेशे से एक निजी बैंक में प्रबंधक मोरे साथ ही सफाई भी देते है कि उनकी चिंता के मूल में बाहर से काम की तलाश में आने वाले लोग नहीं, बल्कि उनकी आड़ में मुंबई के भी क्षेत्र विशेष में इकट्ठा हो रहे लोग है।

नौकरीपेशा या रोजमर्रा काम के लिए निकलना वाला हर शख्स खौफजदा है और बस काम पूरा कर जल्दी से जल्दी घर की चारदीवारी में घुस जाना चाहता है। यूं चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात है सादी वर्दी में जगह-जगह खुफिया बल भी है। दरअसल, मुंबई हमले के एक साल तक भी भारतीय एजेंसियां या मुंबई पुलिस डेविड हेडली और तहव्वुर हुसैन राणा के बारे में कुछ पता न कर सकीं, उससे भी लोगों का अविश्वास पुलिस पर बढ़ा है। बी काम कर रहीं वासंती युके भी मानती हैं कि मुंबई को आतंकियों की नजर से भगवान ही बचा सकता है। नेताओं से तो कोई उम्मीद पहले ही नहीं थी, अब पुलिस भी जैसे लड़ रही है, उसमें तो आतंकी फायदा उठाएंगे ही।

दरअसल, शुक्ला, मोरे या वासंती की चिंता बेवजह ही नहीं है। मुंबई पुलिस कमिश्नर अब्दुल गफूर ने आतंकी हमले की बरसी से ठीक पहले विवादास्पद बयान देकर पुलिस के भीतर चल रही जंग को सतह पर ला दिया है। मामला राजनीतिक हलकों में पहुच गया है। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में मुख्यमंत्री व गृह मंत्री को गफूर के नजरिए पर उठे सवालों के जवाब ढूढे़ नहीं मिले। गफूर का बयान अगर सही है तो पुलिस अधिकारियों की निष्ठा और क्षमता समझी जा सकती है और अगर गलत है तो फिर मुंबई पुलिस की एकजुटता का ऊपर वाला ही मालिक है।

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मुंबई की सुरक्षा के लिए आज से तैनात फोर्स वन

देश में एनएसजी की तर्ज पर पहला त्वरित बल देने वाले पहले राज्य का तमगा मंगलवार को महाराष्ट्र ने हासिल कर लिया। गोरेगांव स्थित स्पेशल रिजर्व पुलिस फोर्स मैदान में मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण व गृह मंत्री आरआर पाटिल ने औपचारिक रूप से फोर्स वन को महाराष्ट्र की सुरक्षा में तैनात करने का ऐलान किया। हेलीकाप्टर समेत 216 कमांडों से सुसज्जित फोर्स वन का पहला बैच हमले की बरसी से पहले सुरक्षा में तैनात कर दिया गया। इस मौके पर कमांडों ने अपने युद्धकौशल और आतंकियों से विभिन्न हालात में निपटने की तकनीक कौशल का भी प्रदर्शन किया।

महाराष्ट्र सरकार का दावा तो है कि फोर्स वन का प्रशिक्षण व क्षमता बिल्कुल एनएसजी सरीखी है, लेकिन यह बड़बोलापन ज्यादा है। वास्तव में क्यूआरटी को आम पुलिस वालों की तरह तीन शिफ्टों में तैनात किया जा रहा है, जबकि त्वरित बल तो 24 घंटे तैयार रहता है, लेकिन तैनात नहीं। इतना ही नहीं, एनएसजी कमांडो जहां रोजाना 300 चक्र फायरिंग करते है, वहीं फोर्स वन कमांडों के लिए 30 चक्र फायरिंग का प्रशिक्षण ही रहा है। फोर्स वन के युद्धकौशल को देखने के बाद एनएसजी के एक अधिकारी की टिप्पणी थी कि अभी इन्हें बहुत मांजने की जरूरत है, लेकिन शुरुआत होना ही अच्छा संकेत है।

 

सरकारी फाइल और मुआवजे का मरहम

अपने देश में आतंकवाद तो स्थायी मेहमान बन चुका है, लेकिन इसके शिकार हुए लोगों का मुआवजा आज भी राजनेताओं और अधिकारियों की लालफीताशाही के बीच झूलता नजर आता है। यही कारण है कि आतंकियों की गोलियों ने मरने वालों के साथ भले कोई भेद न किया हो, लेकिन मृतकों के परिजनों को मिलने वाले सरकारी मुआवजे की राशियों में यह भेद साफ नजर आता है।

मुंबई पर हुए हमले में कुल 179 लोग मारे गए थे। इनमें जो लोग सीएसटी [वीटी] रेलवे स्टेशन के अंदर मारे गए थे, उनके परिजनों को करीब 22 लाख रुपये मुआवजा मिलना निर्धारित हुआ था। लेकिन जो लोग स्टेशन के ठीक बाहर मरे थे, उनके लिए यह राशि घटकर सिर्फ आठ लाख रुपये रह गई। यहां तक कि इस घटना में मारे गए हेमंत करकरे, अशोक काम्टे और विजय सालस्कर जैसे अधिकारियों सहित अन्य सुरक्षाकर्मियों के परिजन भी दुर्भाग्यशाली ही साबित हुए। उन्हें रेल मंत्रालय एवं रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल से तो कुछ मिलना ही नहीं था, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने भी उनके साथ कंजूसी ही दिखाई गई। पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा शहीदों के परिवारों को पेट्रोल पंप देने की घोषणा भी अब तक थोथी ही नजर आ रही है।

मुआवजे का खेल

आतंकी हमले के तुरंत बाद रेलमंत्री ने प्रत्येक मृतक के परिवार के लिए 10 लाख रुपये मुआवजा घोषित किया था। रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल की ओर से मिलने वाले चार लाख रुपये इससे अलग थे। राज्य सरकार ने भी सभी मृतकों के लिए इस बार पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा घोषित किया था। इसके अतिरिक्त उड़ीसा में चर्चो पर हुए हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आतंकवाद एवं सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए लोगों के लिए तीन लाख रुपये की सहायता योजना शुरू की थी। इस प्रकार उक्त सभी स्त्रोतों को मिलाकर प्रत्येक सीएसटी रेलवे स्टेशन परिसर में मारे गए प्रत्येक मृतक के परिवार को कम से कम 22 लाख रुपये एवं सीएसटी परिसर से बाहर मारे गए लोगों के परिवारों को आठ लाख रुपये मुआवजा मिलना तय था। इसमें प्रधानमंत्री राहत कोष से मिलने वाली सहायता राशि शामिल नहीं है, जिसकी घोषणा हमले के दूसरे दिन ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुंबई आकर की थी।

कंजूस राज्य सरकार

आतंकियों के हमले में मारे गए पुलिसकर्मियों के लिए राज्य सरकार ने उदारतापूर्वक 25 लाख रुपये नकद मुआवजे की घोषणा कर दी थी। लेकिन एक दिसंबर, 2008 को जारी शासनादेश से सरकार की कंजूसी उजागर हो जाती है। जिसके अनुसार उक्त राशि मिलने के बाद किसी पुलिसकर्मी की आनड्यूटी मृत्यु पर उसे गृह विभाग से मिलने वाले 13 लाख रुपये दिया जाना उचित नहीं होगा। इस प्रकार आतंकवाद की एक ही घटना में रेलवे स्टेशन के अंदर मारे गए आमजन को 22 लाख रुपये की तुलना में स्टेशन के बाहर आतंकियों की गोली से शहीद हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों के हिस्से में महज 12 लाख रुपये ही आए।

पीएमओ का हाल

सबसे हास्यास्पद स्थिति तो सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री कार्यालय की है। 27 नवंबर, 2008 को प्रधानमंत्री द्वारा घोषित विशेष राहत राशि में घायलों एवं मृतकों को उनकी परिस्थिति के अनुसार अधिकतम दो लाख रुपये तक प्राप्त होने थे। मृतकों एवं घायलों को मिलाकर कुल 403 लोगों को यह लाभ मिलना था। आज तक सिर्फ 30 प्रतिशत लोगों को ही प्रधानमंत्री राहत कोष के चेक प्राप्त हो सके हैं। 79 के तो विवरण तक अभी राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय को नहीं भेजे हैं। इसी प्रकार केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से इस प्रकार की घटनाओं में मिलने वाली तीन लाख रुपये की राशि भी अभी 100 से कम लोगों को ही मिल सकी है।

नहीं मिले पेट्रोल पंप

पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से शहीदों के परिजनों को पेट्रोल पंप देने की घोषणा भी अब तक हवाई ही साबित हुई है। आधे से ज्यादा शहीदों को तो पेट्रोल पंप का आबंटन हुआ ही नहीं है। जिनके नाम से पेट्रोल पंप आबंटित हुए भी हैं, उनका आबंटन भी कागजी ही है। क्योंकि उन्हें पेट्रोल पंप के बजाय पेट्रोलियम कंपनी से प्रतिमाह 25 हजार रुपये नकद दिलवाने की व्यवस्था मात्र की गई है। यह भी कब तक जारी रहेगी, कुछ स्पष्ट नहीं है। ऐसे हवाई पेट्रोल पंपों के लाभार्थियों में हेमंत करकरे एवं अशोक काम्टे जैसे हाई प्रोफाइल शहीदों के परिवार भी शामिल हैं।

 

सिर्फ 19 रुपये में पुराना नंबर रखना संभव

अगर आप एक मोबाइल कंपनी की सेवाएं छोड़ कर किसी दूसरी कंपनी का कनेक्शन लेना चाहते हैं तो आपको केवल एक मुश्त 19 रुपये खर्च करने होंगे।

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण [ट्राई] ने शुक्रवार को इस बारे में साफ निर्देश दूरसंचार कंपनियों को दे दिए। इस निर्देश के मुताबिक नंबर पोर्टबिलिटी की सुविधा लेने वाले ग्राहकों को पुराने नंबर जारी रखने के लिए 19 रुपये का भुगतान करना होगा।

महानगरों सहित ‘ए’ श्रेणी के शहरों में नंबर पोर्टबिलिटी की सुविधा 31 दिसंबर, 2009 से लागू की जाएगी। देश के अन्य हिस्सों में यह मार्च, 2010 से लागू की जानी है।

इस बारे में ट्राई की तरफ से जारी प्रावधानों के मुताबिक यह शुल्क ग्राहकों को नई सेवा प्रदाता कंपनी को देना होगा। शुल्क लगाने की मुख्य वजह यह है कि पुराने नंबर की जांच- पड़ताल नई कंपनी को अपने स्तर पर करनी होगा। इसमें वह चार दिनों का वक्त लेगी। अगर कंपनियां चाहें तो वे इस शुल्क को माफ भी कर सकती हैं।

माना जा रहा है कि मोबाइल सेवा में उतरने वाली नई कंपनियों ने नंबर पोर्टबिलिटी का फायदा उठाने की पूरी तैयारी कर ली है। चूंकि जिन शहरों में पहले चरण में यह सुविधा शुरू की जा रही है वहां पहले से ही काफी जबरदस्त प्रतिस्पद्र्धा चल रही है। पुरानी कंपनियों ने बाजार पर काफी हद तक कब्जा जमा लिया है। ऐसे में जिन कंपनियों को नया लाइसेंस मिला है वे मौजूदा कंपनियों के बाजार पर कब्जा जमाने के लिए इस सेवा का फायदा उठा सकती हैं। यह भी माना जा रहा है कि मौजूदा सेवा प्रदाता कंपनियां भी उन ग्राहकों के बाहर जाने से खुश होंगी जिनसे कोई खास कारोबार नहीं मिलता है। सनद रहे कि हाल ही में किये गये एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि 45 फीसदी उपभोक्ता मोबाइल फोन कंपनियों की सेवाओं से असंतुष्ट हैं। इससे यह भी पता चला है कि प्री पेड ग्राहक और कम इस्तेमाल करने वाले ग्राहक अपनी सेवा प्रदाता कंपनी को छोड़ने में ज्यादा आनाकानी नहीं करेंगे।

 

नेताजी की मौत से जुड़ा हर रिकार्ड उजागर हो – केंद्रीय सूचना आयोग [सीआईसी]

केंद्रीय सूचना आयोग [सीआईसी] ने कहा है कि सुभाष चंद्र बोस की मौत से जुड़ा हर रिकार्ड सार्वजनिक किया जाना चाहिए। सीआईसी ने गृह मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह 1945 में नेताजी के अचानक लापता होने के मामले की जांच करने वाले जस्टिस मुखर्जी आयोग के सभी दस्तावेज सार्वजनिक करे, चाहे वे किसी भी मंत्रालय और राज्य सरकार से संबंधित हों।

सीआईसी ने इससे पहले भी गृह मंत्रालय को इस मामले में मुखर्जी आयोग द्वारा सूचीबद्ध प्रमाण उजागर करने को कहा था। लेकिन, आयोग ने अन्य राज्यों से जुड़े रिकार्डो पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। आयोग ने अब अपने फैसले में कहा है, ‘गृह मंत्रालय 20 कार्य दिवसों के अंदर आवेदनकर्ता को हर जानकारी मुहैया कराए।’ सूचना के अधिकार के तहत चंद्रचूड़ घोष ने यह जानकारी मांगी थी। अर्जी दायर करने के करीब 34 महीने बाद आयोग का यह फैसला आया है।

इससे पहले पिछले महीने सीआईसी के समक्ष गृह मंत्रालय का पक्ष रखते हुए संयुक्त सचिव लोकेश झा ने कहा था कि मंत्रालय को इस मामले में अपने दस्तावेज जारी करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन अन्य मंत्रालय व कुछ राज्य सरकारों से जुड़े दस्तावेज जारी करने में गृह मंत्रालय असमर्थ है। गौरतलब है कि नेताजी की गुमशुदगी से जुड़े मामले की जाच के लिए 1999 में एक सदस्यीय मुखर्जी आयोग का गठन किया गया था। आयोग की जांच रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

 

१०० वी पोस्ट :- अत्याधुनिक हथियारों से लैस होगा एनएसजी

केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने शुक्रवार को कहा कि किसी भी प्रकार की आतंकी घटना से निपटने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड [एनएसजी] को अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित किया जाएगा।
एनएसजी के 25वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा, ‘हमने एनएसजी को नागरिक विमानों के इस्तेमाल के लिए अधिकृत कर दिया है। एनएसजी को जल्द ही उच्च तकनीक वाले नए अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया जाएगा। यह प्रक्रिया अपने अंतिम दौर में है।’
चिदंबरम ने कहा, ’26/11 की घटना के बाद एनएसजी की भूमिका एक बार फिर से परिभाषित हुई है। हमने एनएसजी के मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता तथा अन्य दो क्षेत्रीय केंद्र स्थापित किए है। प्रत्येक केंद्र पर 5000 जवान तैनात रहेगे।’
एनएसजी की भूमिका की सराहना करते हुए उन्होंने कहा, ‘आतंकवाद के खतरे से निपटने के लिए देश को समृद्ध और कुशल प्रशिक्षित एनएसजी की आवश्यकता है।’

इस मौके पर प्रसिद्ध गीतकार गुलज़ार और संगीतकार गायक शंकर महादेवन भी मौजूद थे !

 

विश्व में कहां ठहरते हैं हमारे विश्वविद्यालय

पिछले सप्ताह जब से ‘द टाइम्स-क्यूएस’ की दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग जारी हुई है, देश में अपने विश्वविद्यालयों की दशा को लेकर हंगामा मचा हुआ है। वजह यह कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पहले 10 या 50 या 100 या फिर 150 विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का कोई विश्वविद्यालय जगह नही बना पाया है।
यही नहीं, सर्वश्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों की सूची में 163वें स्थान पर आईआईटी मुंबई और 181वें स्थान पर आईआईटी दिल्ली को जगह मिल सकी है, जबकि लोकप्रिय और वास्तविक अर्थो में आईआईटी को विश्वविद्यालय नहीं माना जाता है।
यह सचमुच चिंता और अफसोस की बात है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों की सूची में दो आईआईटी को छोड़कर देश का कोई विश्वविद्यालय जगह बना पाने में कामयाब नहीं हुआ है। इससे देश में उच्च शिक्षा की मौजूदा स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है।
ऐसा नहीं है कि यह सच्चाई सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग जारी होने के बाद पहली बार सामने आई है। यह एक तथ्य है कि पिछले कई वर्षो से जारी हो रही इस वैश्विक रैंकिंग में भारत के विश्वविद्यालय अपनी जगह बना पाने में लगातार नाकामयाब रहे हैं।
सवाल है कि इस वैश्विक रैंकिंग को कितना महत्व दिया जाए? यह भी एक तथ्य है कि ‘द टाइम्स-क्यूएस’ की विश्वविद्यालयों की सालाना वैश्विक रैकिंग रिपोर्ट और ऐसी अन्य कई रिपोर्टो की प्रविधि और चयन प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं। इस रैकिंग में विकसित और पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों के प्रति झुकाव और आत्मगत मूल्याकन की छाप को साफ देखा जा सकता है, लेकिन इन सबके बावजूद दुनिया भर के शैक्षणिक समुदाय में इस वैश्विक विश्वविद्यालय रैंकिंग की मान्यता और स्वीकार्यता बढ़ती ही जा रही है। उसकी अपनी ही एक करेंसी हो गई है।
दरअसल, इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पिछले दो दशकों में उच्च शिक्षा का जो वैश्विक बाजार बना है, उसके लिए विश्वविद्यालयों की इस तरह की रैंकिंग एक अनिवार्य शर्त है। यह रैंकिंग वैश्विक शिक्षा बाजार के उन उपभोक्ताओं के लिए है, जो बेहतर अवसरों के लिए विश्वविद्यालय चुनते हुए इस तरह की रैंकिंग को ध्यान में रखते हैं।
निश्चय ही, इस तरह की रैंकिंग से सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों को न सिर्फ संसाधन जुटाने में आसानी हो जाती है, बल्कि वे दुनिया भर से बेहतर छात्रों और अध्यापकों को भी आकर्षित करने में कामयाब होते हैं। इस अर्थ में, सर्वश्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों की सूची में आईआईटी को छोड़कर एक भी भारतीय विश्वविद्यालय के न होने से साफ है कि भारत उच्च शिक्षा के वैश्विक बाजार में अभी भी आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि उपभोक्ता ही बना हुआ है।
आश्चर्य नहीं कि सरकार के तमाम दावों के बावजूद अभी भी देश से हर साल लाखों छात्र उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया तक के विश्वविद्यालयों की ओर रुख कर रहे हैं। यही नहीं, ‘ब्रेन ड्रेन’ रोकने और ‘ब्रेन गेन’ के दावों के बीच अब भी सैकड़ों प्रतिभाशाली शिक्षक और शोधकर्ता विदेशों का रुख कर रहे हैं।
इस मायने में वैश्विक विश्वविद्यालयों की यह रैंकिंग उच्च शिक्षा के कर्ता-धर्ताओं को न सिर्फ वास्तविकता का सामना करने का एक मौका देती है, बल्कि एक तरह से चेतावनी की घटी है। वह इसलिए कि दोहा दौर की व्यापार वार्ताओं के तहत सेवा क्षेत्र को व्यापार के लिए खोलने की जो बातचीत चल रही है, उसमें भारत अपने उच्च शिक्षा क्षेत्र को खोलने के लिए तत्पर दिख रहा है।
इस तत्परता का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में बुलाने के लिए कुछ ज्यादा ही उत्साहित दिख रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जब भारत और उसके विश्वविद्यालय वैश्विक शिक्षा बाजार में कहीं नहीं हैं तो उच्च शिक्षा का घरेलू बाजार विदेशी शिक्षा सेवा प्रदाताओं या विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए खोलने के परिणामों के बारे में क्या यूपीए सरकार ने विचार कर लिया है?
क्या ऐसे समय में, जब भारतीय विश्वविद्यालय विकास और गुणवत्ता के मामले में विकसित और पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों से काफी पीछे हैं, उस समय विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश के दरवाजे खोलने का अर्थ उन्हें एक असमान प्रतियोगिता में धकेलना नहीं होगा? क्या इससे देसी विश्वविद्यालयों के विकास पर असर नहीं पड़ेगा?
निश्चय ही इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है, लेकिन ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार उच्च शिक्षा में बुनियादी सुधार और बेहतरी के लिए देसी विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता बढ़ाने के वास्ते उन्हें जरूरी संसाधन और संरक्षण मुहैया कराने के बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का जिम्मा विदेशी विश्वविद्यालयों को सौंपकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती है।
हालाकि कपिल सिब्बल उच्च शिक्षा में सुधार के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि वे उच्च शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी सुधार के बजाय जहां-तहां पैबंद लगाने की कोशिश कर रहे हैं। हकीकत यह है कि यूपीए सरकार को उच्च शिक्षा में पैबंद लगाने और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप और निजी क्षेत्र को बढ़ाने जैसे पिटे-पिटाए फार्मूलों को फिर से आजमाने के बजाय उन बुनियादी सवालों और समस्याओं से निपटने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिए, जिनकेकारण उच्च शिक्षा एक शैक्षणिक जड़ता से जूझ रही है।
आज वास्तव में जरूरत यह है कि इस शैक्षणिक जड़ता को तोड़ने के लिए उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पुनर्जागरण के लिए उपयुक्त माहौल बनाया जाए। इसके लिए विश्वविद्यालयों के व्यापक जनतात्रिक पुनर्गठन के साथ-साथ उन्हें वास्तविक स्वायत्तता और शैक्षणिक स्वतंत्रता उपलब्ध कराना जरूरी है।
असल में, आज देश में उच्च शिक्षा के सामने तीन बुनियादी चुनौतिया हैं- उच्च शिक्षा के विस्तार, उसमें देश के सभी वर्गो के समावेश और उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने की। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि सरकार उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन और वित्तीय मदद मुहैया कराए, लेकिन अफसोस की बात यह है कि आर्थिक सुधारों की शुरुआत के बाद 90 के दशक में उच्च शिक्षा के बजट में लगातार कटौती हुई, जिसका नतीजा यह हुआ कि अधिकाश विश्वविद्यालयों में न सिर्फ पठन-पाठन पर असर पड़ा, बल्कि वे छोटी-छोटी शैक्षणिक जरूरतों और संसाधनों से भी महरूम हो गए।
एक अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के विकसित देशों की तो बात ही छोड़ दीजिए, ब्रिक देशों [ब्राजील, रूस, भारत और चीन] में उच्च शिक्षा में प्रति छात्र सबसे कम व्यय भारत में होता है। आश्चर्य नहीं कि वैश्विक विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में पहले 200 विश्वविद्यालयों की सूची में हमारे पड़ोसी देश चीन के कई विश्वविद्यालयों के नाम हैं, लेकिन भारत के विश्वविद्यालय उस सूची में जगह नहीं बना पाए।
ऊपर से तुर्रा यह कि यूपीए सरकार अब विश्वविद्यालयों को अपने बजट का कम से कम 20 प्रतिशत खुद जुगाड़ने के लिए कह रही है।
यही नहीं, इस समय उच्च शिक्षा पर बजट बढ़ाने और 11वीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा को सबसे अधिक महत्व देने के यूपीए सरकार के तमाम बड़े-बड़े दावों के बावजूद सच यह है कि सरकार उच्च शिक्षा पर जीडीपी का 0.39 प्रतिशत से भी कम खर्च कर रही है। इसकी तुलना में, चीन उच्च शिक्षा पर इसके तीन गुने से भी अधिक खर्च कर रहा है।
असल में, वैश्विक रैकिंग में जगह न बना पाने से अधिक चिंता की बात यह है कि आजादी के 60 सालों बाद भी उच्च शिक्षा के विस्तार की हालत यह है कि देश में विश्वविद्यालय जाने की उम्र के सिर्फ दस फीसदी छात्र ही कालेज या विश्वविद्यालय तक पहुंच पाते हैं, जबकि विकसित और पश्चिमी देशों में 35 से 50 फीसदी छात्र विश्वविद्यालयों में पहुंचते हैं। आश्चर्य नहीं कि मानव विकास सूचकाक में भी भारत 183 देशों की सूची में 134वें स्थान पर है।
आखिर मानव विकास में फीसड्डी होकर कोई देश सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग में जगह कैसे बना सकता है?
जो हमसे हैं बेहतर
‘द टाइम्स-क्यूएस’ 2009 की इस रैंकिंग में अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी पहले स्थान पर बरकरार है। ब्रिटेन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी एक पायदान चढ़कर दूसरे स्थान पर आ गई है। वहीं, अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी एक पायदान खिसककर तीसरे नंबर पर पहुंच गई है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन को इंपीरियल कॉलेज, लंदन के साथ पाचवें स्थान पर संयुक्त रूप से जगह दी गई है।
रिपोर्ट में ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों की तारीफ कहा गया है कि इस रैंकिंग में ब्रिटेन ने अपना वजन बढ़ाया है, लेकिन इसके बावजूद वह अमेरिका से पीछे है। टाप-10 और टाप-100 में ब्रिटेन के क्रमश: चार और 18 विश्वविद्यालयों ने जगह बनाई है। टाप-100 में एशियाई विश्वविद्यालयों की संख्या 14 से बढ़कर 16 हो गई है। इनमें टोक्यो यूनिवर्सिटी ने इस रैंकिंग में शीर्ष 22वा स्थान हासिल किया है, जबकि हागकाग यूनिवर्सिटी को 24वा स्थान मिला है।
वहां शिक्षण के प्रति समर्पण ज्यादा है
पश्चिमी और यूरोपीय विश्वविद्यालयों का इतिहास भले ही 500-600 वर्ष पुराना हो, लेकिन पश्चिमी शिक्षा जिसे हम बार-बार आदर्श के रूप में देखते हैं, वह बहुत पुरानी नहीं हैं। इसमें समय के साथ बदलाव भी होते रहे हैं। दूसरे, विदेशों में उच्च शिक्षा में शोध को बहुत महत्व दिया जाता है।
ऐसा नहीं है कि विदेशों में लोग अध्यापन को पैसों से नहीं जोड़ते, लेकिन वहां अध्यापकों में शिक्षा के लिए समर्पण हमसे ज्यादा है। सबसे बड़ी बात तो यह भी है कि पश्चिमी देशों में शोधकार्यो को भी बढ़ावा दिया जाता रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन शोध से जुड़ी किसी भी जरूरतों में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रख्यात अर्थशास्त्री जेके मेहता अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष थे। उस समय जो लोग टॉप किया करते थे, उनका चयन विदेशी विश्वविद्यालयों में तदर्थ रूप से पढ़ाने के लिए हो जाया करता था। एक विद्यार्थी जिसका चयन विदेशी विश्वविद्यालय में शिक्षक और आईएएस, दोनों ही जगहों पर हो गया, वह मेहता साहब से सलाह लेने गया कि मैं किसी बतौर कैरियर अपनाऊं?
मेहता साहब ने पूछा- विश्वविद्यालय में तो तुम्हारा चयन स्थाई रूप से हो ही जाएगा। उसके बाद तुम रीडर बनना चाहोगे, और फिर प्रोफेसर। छात्र ने कहा, ‘हां।’ मेहता साहब ने कहा इसका मतलब तुम नौकरी करना चाहते हो शिक्षक नहीं बनना चाहते। जब नौकरी ही करना चाहते हो तो तुम्हारे लिए आईएएस ही ठीक है।
भारतीय विश्वविद्यालयों के प्रदर्शन में कमी का एक और जो बड़ा कारण है, वह यह कि हमारे यहां का अच्छा छात्र तो विदेश चला जाता है और औसत छात्र यहीं रह जाता है। जबकि हमारे यहां जो विदेशी छात्र आते हैं, वे सामान्य दर्जे के होते हैं। पहले जो अध्यापक होते थे, वे भले ही पीएचडी न हों, लेकिन शोध करने और सीखने के प्रति उनकी रुचि रहती थी। वह शिक्षा और छात्रों के भविष्य के प्रति गंभीर रहते थे, लेकिन अब इन प्रवृत्तियों में गिरावट आई है। इसके पीछे कहीं न कहीं सरकारी उदासीनता और लोगों की व्यक्तिगत स्तर पर मानसिकता में बदलावों को भी जिम्मेवार ठहराया जा सकता है।
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भाई साहब, जब यूपीए सरकार की पालनहार खुद और उनका बेटा तक विदेश में पढ़ा हुआ हो तो क्या फर्क पड़ता है अगर यहाँ का युवा भी विदेश जा कर पढना चाहे ?? हुआ करे ‘ब्रेन ड्रेन’ !! किस को फर्क पड़ता है यहाँ ?! अगर शिक्षा के ऊपर पड़ा कफ़न हटाया गया तो कौन झेलेगा आती हुयी बदबू को ?? चिंता है उच्च शिक्षा की मौजूदा स्थिति की जबकि बेसिक शिक्षा का हाल और भी बुरा है !!
कपिल सिब्बल साहब, उच्च शिक्षा तो हमारे युवा तब लेगे ना जब उनके पास बेसिक शिक्षा हो ?? सो कदम कदम चले…. बहुत लम्बी कूदने की ना सोचे !!
वैसे आप मंत्री है …..ज्यादा जानते है …..हम तो सिर्फ़ जनता है जो आप करोगे हमारी भलाई के लिए ही करोगे …..एसा हम मानते है !!

बाकी कोई बात बुरी लगी हो तो अज्ञानी समझ माफ़ करे वह क्या है ना हमे तो उच्च शिक्षा मिली ही नहीं !!