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Category Archives: बात मेरे दिल की

मेरी वह मुराद …………बिन मांगे जो पूरी हुयी !!

कभी कभी जीवन में कुछ ऐसी घटनाएँ घट जाती है जो आपके सोचने का नजरिया बदल, आपको एक लक्ष्य दे देती है …………….मेरी परसों की पोस्ट पर की गयी एक टिपण्णी ने मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही किया है |

यह थी वह टिपण्णी :- सतीश सक्सेना said… कलाजगत के इस गंभीर क्षति और बेहद दुखदायी घटना पर क्या प्रतिक्रिया दें …हो सके तो इन के आश्रितों का हाल क्या है मालूम करें और अगर कोई मुसीबत में है तो मैं व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर साथ हूँगा ! चूंकि आपको इस मौके पर उनकी याद आयी है अतः यह पुण्य कार्य भी आप ही करें ! अन्यथा नयी पोस्ट के साथ हम सब कल इन्हें भूल जायेंगे ! मैं अपना पता दे रहा हूँ !

सादर

Satish Saxena

satish1954@gmail.com

+919811076451

मैंने सतीश भाई को फ़ोन किया ताकि इस विषय पर उन से बात कर सकू ……………लगभग ११ मिनट तक चली बातचीत में मुझे यह समझ आ गया कि यह टिपण्णी केवल भावनाओ में बह कर नहीं की गई है बल्कि सतीश भाई सच में ऐसा ही सोचते है | मैं बता नहीं सकता दिल को कितना सुकून पंहुचा उन से बात करने के बाद ! आज हमारे देश और समाज को ऐसी ही सोच वाले लोगो की बहुत जरूरत है |

यह सच है हम सब रोज़ कितनी ही पोस्टे पढ़ते है और फिर भूल जाते है ……………..मेरी यह पोस्ट भी ४ दिनों में आपके जहान से निकल जाएगी पर ………………एक विनती है आपसे …………..कृपया उन चार दिनों तक मेरी पोस्ट में लिखी बातों पर गौर करें और हो सके तो आप भी ऐसा कुछ अपने आस पास करें !

ज्ञात हो कि ठीक एक साल पहले ८ जून २००९ ही के दिन एक सड़क दुर्घटना में मंच के लोकप्रिय कवि ओम प्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड सिंह गुज्जर का निधन हो गया था और ओम व्यास तथा ज्ञानी बैरागी गंभीर रूप से घायल हुए थे |

आज जब इस घटना को एक साल बीत चूका है ……………….हम में से कितनो को यह दुखद घटना याद भी है ……………………………….शायद बहुतों को नहीं ! यही होता है …………….क्यों कि हम लोग सब अपनी अपनी ज़िन्दगी में इस कदर मशरूफ है कि हम को अपने सिवाए कुछ और सूझता ही नहीं है | कौन जिया कौन मरा …….किस को क्या खबर ??

पर क्या आपने सोचा यही सब एक दिन हमारे साथ भी हो सकता है !!

तब भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा हमारे जाने से ………………….अगर किसी को फर्क पड़ेगा तो सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे परिवार को !

उन कवियों के जाने का भी फर्क पड़ा है उनके परिवार पर ……………….क्यों ना कुछ देर रुक कर, अपनी रोज़ कि इस भागम भाग वाली ज़िन्दगी से, हम जाने उनका हाल !

इसी सोच से प्रभावित हो कर मैंने आज कुछ लोगो को फ़ोन कर यह मालूमात करने की कोशिश करी कि क्या किसी को उस हादसे में मरे गए कवियों के परिवार के विषय में कुछ जानकारी है ……………….और क्या कोई और भी मेरे इस प्रयास में मेरा साथ देगा ?

सब से पहले मेरी बात हुयी महफूज़ अली भाई से जिन्होंने अपना पूरा सहयोग देने का वादा किया उसके बाद मैंने मुंबई फ़ोन लगाया देव कुमार झा को …………….पूरी बात से उनको अवगत करवाने के बाद जब मैंने उनसे सहयोग की बात कही तो यह जान बहुत ख़ुशी हुयी कि देव बाबु भी इस मुहीम में पूरा साथ देने को तैयार है | मेरी इस मुहीम में एक सुखद मोड तब आया जब उसके बाद मैंने फ़ोन किया अपने अलबेले बड़े भाई अलबेला खत्री जी को |

अलबेला जी ने पहले तो मेरी पूरी बात सुनी फिर मुझे काफी सराहा …………..उसके बाद जो खबर उन्होंने मुझे दी ………..वह यह थी कि उस दुखद हादसे में मारे गए किसी भी कवि के परिवार में कोई भी वितीय संकट नहीं है और सब लोग धीरे धीरे इस सदमे से उबार रहे है |

यह खबर केवल खबर नहीं बल्कि एक तरह से मेरी वह मुराद थी जो बिना मांगे ही पूरी हो गयी | मैं अपनी भावनाएं यहाँ शब्दों में नहीं लिख सकता पर यह एक ऐसी अनुभूति है जैसा अपने परिवार का हित जानने के बाद होती है |

आप सब को यह जान ख़ुशी होगी कि हम लोगो जिस मुहीम के यह एक जुट हो रहे थे वह पहले ही रंग ला चुकी है | अपने परिवार में सब ठीक है सिवाए इसके कि वह चार लोग जो हम सब को बहुत प्रिये थे आज हमारे बीच नहीं है |

आज एक और बात बहुत अच्छे से समझ में आ गयी कि अपने तमाम विवादों और कुछ बुराइयों के बाद भी ब्लॉगजगत आज भी किसी भी सार्थक पहल के लिए एक जुट है | भगवान् से यही दुआ करता हूँ कि यह एकता बनी रहे और हाल फिलहाल में जो भी विवाद हुए है उनका असर ब्लॉग जगत पर कम से कम हो !

 

….ताज फिर भी सरताज है

गेट वे आफ इडिया की तरफ तिरछी निगाहो से देखते होटल ताज के सामने आज कुछ भीड़ उत्सुक तमाशबीनों कीहै या फिर जुटे है गेट वे पर रोज चहलकदमी करने वाले मुंबईकर। अगर उत्सुकता और यादों को पूरे दृश्य से निकाल दिया जाए तो एक साल पहले आज के ही दिन गेट वे और ताज में से किसी को यह अंदाज भी नहीं था कि उनके इतिहास में ठीक अड़तालीस घटे बाद एक अजीबोगरीब पन्ना जोड़ने वाले दस लोग उनकी मुंबई से कुछ ही दूर तैर रहे है। वह ऐसा इतिहास छोड़ जाएंगे जो कोई शहर, कोई इमारत और कोई देश अपने साथ जोड़ना नहीं चाहता। मगर इतिहास में रचे-बसे और रमे ताज को यह तमगा भी मिलना था कि जब दुनिया आतंक को याद करेगी तब स्मृति में शेष डब्ल्यूटीसी, मैरियट या ओक्लोहामा सिटी बिल्डिग के साथ मुंबई के ताज होटल के जलते गुंबद भी उसकी यादों में तैर जाएंगे।

ताज अगर मुंबई का गौरव है तो पूरी दुनिया के लिए आतंक के जघन्य चेहरे की पहचान भी। यह ताज के इतिहास की विलक्षण असंगति है। बुधवार यानी 25 नवंबर से 26 नवंबर तक अलग-अलग आयोजनों में मुंबई व ताज के उस महज एक साल पुराने ताजा इतिहास को याद करने वाली है जिसे देश ने विस्मय, भय, यंत्रणा, क्षोभ और करुणा के साथ करीब 60 घटे तक देखा था। आतंक की आधी झेलने वाली ताज की हेरिटेज यानी पुरानी बिल्डिग के ऊपर की अधिकाश मंजिलें अभी बंद है। गुंबद पर रोशनी है, मगर नीचे के तलों पर उदास अंधेरा है। ताज चुपचाप उन निशानों को मिटाने की कोशिश कर रहा है, जो आतंकी उसे देकर गए है। सुनते है, जनवरी में ताज का यह विंग मेहमानों के लिए खुलेगा।

आतंक के निशान भले ही मिट जाएं मगर इतिहास बड़ा जालिम है। वह अच्छा हो या बुरा, मगर चिपक कर बैठ जाता है और मिटता नहीं। लेकिन आखिर एक इमारत में कितना इतिहास भरा जा सकता है। ताज जैसी इमारतें दुनिया में बिरली ही होंगी जिनसे इतिहास इतने विभिन्न तरह के प्रसंगों में बोलता है।

विदेश न जा पाने वाले लोगों के लिए सौ साल पहले मुंबई का ताज होटल एक अविश्वसनीय इमारत थी। उम्र में गेट वे आफ इडिया से भी बड़ा ताज भारत का पहला भव्य होटल था। मुंबई में बिजली से जगमगाने वाली पहली इमारत, मुंबई में आइसक्रीम बनाने की पहली मशीन, पहली लाड्री, पालिश करने की पहली मशीन, पहली लिफ्ट, पहला जेनरेटर..और भी बहुत कुछ मुंबई को उस ताज होटल ने दिखाया जिसे बनाने की योजना सुन कर जमशेद जी की बहनें चौंक कर यह पूछ उठीं थी क्या तुम सच में एक भटियारखाना बनाओगे? खाना खाने की जगह!!

1903 में जनता के लिए खुले ताज होटल को लेकर टाटा परिवार ने कभी यह नहीं सोचा था कि 2008 में ताज के इतिहास में एक ऐसा पन्ना जुड़ेगा जिससे मुंबई की दृश्यावली की पहचान बन चुके इस जीवंत इतिहास को दुनिया में आतंक के निशाने के तौर पर भी जाना जाएगा। वक्त ने बिना मागे ताज को यह इतिहास भी बख्श दिया है।

गुरुवार को ताज के सामने मुंबईकर आतंक के उस इतिहास को याद करेगे लेकिन शायद इस गर्व के साथ कि डब्ल्यूटीसी और मैरियट अब इतिहास में शेष है, मगर आतंक से जूझ कर भी ताज सिर उठाये खड़ा है। साहस और गरिमा के साथ।

 

सरकारी फाइल और मुआवजे का मरहम

अपने देश में आतंकवाद तो स्थायी मेहमान बन चुका है, लेकिन इसके शिकार हुए लोगों का मुआवजा आज भी राजनेताओं और अधिकारियों की लालफीताशाही के बीच झूलता नजर आता है। यही कारण है कि आतंकियों की गोलियों ने मरने वालों के साथ भले कोई भेद न किया हो, लेकिन मृतकों के परिजनों को मिलने वाले सरकारी मुआवजे की राशियों में यह भेद साफ नजर आता है।

मुंबई पर हुए हमले में कुल 179 लोग मारे गए थे। इनमें जो लोग सीएसटी [वीटी] रेलवे स्टेशन के अंदर मारे गए थे, उनके परिजनों को करीब 22 लाख रुपये मुआवजा मिलना निर्धारित हुआ था। लेकिन जो लोग स्टेशन के ठीक बाहर मरे थे, उनके लिए यह राशि घटकर सिर्फ आठ लाख रुपये रह गई। यहां तक कि इस घटना में मारे गए हेमंत करकरे, अशोक काम्टे और विजय सालस्कर जैसे अधिकारियों सहित अन्य सुरक्षाकर्मियों के परिजन भी दुर्भाग्यशाली ही साबित हुए। उन्हें रेल मंत्रालय एवं रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल से तो कुछ मिलना ही नहीं था, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने भी उनके साथ कंजूसी ही दिखाई गई। पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा शहीदों के परिवारों को पेट्रोल पंप देने की घोषणा भी अब तक थोथी ही नजर आ रही है।

मुआवजे का खेल

आतंकी हमले के तुरंत बाद रेलमंत्री ने प्रत्येक मृतक के परिवार के लिए 10 लाख रुपये मुआवजा घोषित किया था। रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल की ओर से मिलने वाले चार लाख रुपये इससे अलग थे। राज्य सरकार ने भी सभी मृतकों के लिए इस बार पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा घोषित किया था। इसके अतिरिक्त उड़ीसा में चर्चो पर हुए हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आतंकवाद एवं सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए लोगों के लिए तीन लाख रुपये की सहायता योजना शुरू की थी। इस प्रकार उक्त सभी स्त्रोतों को मिलाकर प्रत्येक सीएसटी रेलवे स्टेशन परिसर में मारे गए प्रत्येक मृतक के परिवार को कम से कम 22 लाख रुपये एवं सीएसटी परिसर से बाहर मारे गए लोगों के परिवारों को आठ लाख रुपये मुआवजा मिलना तय था। इसमें प्रधानमंत्री राहत कोष से मिलने वाली सहायता राशि शामिल नहीं है, जिसकी घोषणा हमले के दूसरे दिन ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुंबई आकर की थी।

कंजूस राज्य सरकार

आतंकियों के हमले में मारे गए पुलिसकर्मियों के लिए राज्य सरकार ने उदारतापूर्वक 25 लाख रुपये नकद मुआवजे की घोषणा कर दी थी। लेकिन एक दिसंबर, 2008 को जारी शासनादेश से सरकार की कंजूसी उजागर हो जाती है। जिसके अनुसार उक्त राशि मिलने के बाद किसी पुलिसकर्मी की आनड्यूटी मृत्यु पर उसे गृह विभाग से मिलने वाले 13 लाख रुपये दिया जाना उचित नहीं होगा। इस प्रकार आतंकवाद की एक ही घटना में रेलवे स्टेशन के अंदर मारे गए आमजन को 22 लाख रुपये की तुलना में स्टेशन के बाहर आतंकियों की गोली से शहीद हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों के हिस्से में महज 12 लाख रुपये ही आए।

पीएमओ का हाल

सबसे हास्यास्पद स्थिति तो सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री कार्यालय की है। 27 नवंबर, 2008 को प्रधानमंत्री द्वारा घोषित विशेष राहत राशि में घायलों एवं मृतकों को उनकी परिस्थिति के अनुसार अधिकतम दो लाख रुपये तक प्राप्त होने थे। मृतकों एवं घायलों को मिलाकर कुल 403 लोगों को यह लाभ मिलना था। आज तक सिर्फ 30 प्रतिशत लोगों को ही प्रधानमंत्री राहत कोष के चेक प्राप्त हो सके हैं। 79 के तो विवरण तक अभी राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय को नहीं भेजे हैं। इसी प्रकार केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से इस प्रकार की घटनाओं में मिलने वाली तीन लाख रुपये की राशि भी अभी 100 से कम लोगों को ही मिल सकी है।

नहीं मिले पेट्रोल पंप

पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से शहीदों के परिजनों को पेट्रोल पंप देने की घोषणा भी अब तक हवाई ही साबित हुई है। आधे से ज्यादा शहीदों को तो पेट्रोल पंप का आबंटन हुआ ही नहीं है। जिनके नाम से पेट्रोल पंप आबंटित हुए भी हैं, उनका आबंटन भी कागजी ही है। क्योंकि उन्हें पेट्रोल पंप के बजाय पेट्रोलियम कंपनी से प्रतिमाह 25 हजार रुपये नकद दिलवाने की व्यवस्था मात्र की गई है। यह भी कब तक जारी रहेगी, कुछ स्पष्ट नहीं है। ऐसे हवाई पेट्रोल पंपों के लाभार्थियों में हेमंत करकरे एवं अशोक काम्टे जैसे हाई प्रोफाइल शहीदों के परिवार भी शामिल हैं।

 

सच्चा प्यार चाहिए या नानवेज जोक….. ड़ाल करें …..

मैं हूं एक प्यारी सी कुंवारी लड़की। आप हमसे किसी भी तरह की बात कर सकते हैं। चाहे वह..। क्या आपको चाहिए सच्चा प्यार? तो काल कीजिए .. नंबर पर। दस रुपये प्रति मिनट की दर से होगी यह काल। क्या आप बोर हो रहे हैं तो फिर ‘जोक’ है न आपके लिए। अरे! ‘नानवेज जोक’ भी है भाई।

मोबाइल कंपनियों का यह खेल आजकल जबर्दस्त तरीके से लोगों को परेशान किये है। पहले, लगातार एक नंबर से फोन आते थे। लोगों ने उसे पहचान लिया था। काल आते ही उस नंबर को उठाना ही बंद कर दिया। पर अब तो मोबाइल कंपनियों के काल सेंटर से नंबर बदल-बदल कर फोन आ रहे हैं।

दिन भर में औसतन दस से पंद्रह एसएमएस तो इस तरह के आ ही जाते हैं। कहने को तो इस पर पाबंदी है पर देश में इसकी कोई सीधी व्यवस्था नहीं कि आप इस तरह के काल की शिकायत संबंधित कंपनी के खिलाफ कर सकें या फिर इस तरह के काल आपके मोबाइल पर न आयें। समस्या इतनी बड़ी है कि हर घर का औसतन तीन से चार आदमी इस समस्या से परेशान है। मेरा ख़ुद का नम्बर NATIONAL DO NOT DISTURB REGISTRY में ragistar किया हुआ है पर फ़िर भी कॉल आ रही है !

मोबाइल कंपनियों का हाल यह है कि अब समाज के संस्कार पर भी चोट करना शुरू कर दिया है। जब काल सेंटर से संबंधित मोबाइल कंपनी द्वारा ग्रुप एसएमएस अपने ग्राहकों को किया जाता है तो उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं रहती कि वह किस उम्र के लोगों को अपना संदेश भेज रहे हैं और उसे पढ़ेगा कौन?

एक संदेश की बानगी देखिए-आप हिना से दोस्ती करना चाहते हैं तो .. नंबर पर आइए, टीना ..नंबर पर मिलेगी और फिर करीना.. नंबर पर। वृद्ध दादा जी एसएमएस नहीं पढ़ पाते हैं और अपने किशोर पोते को कहते हैं क्या है? जब वह एसएमएस अपने दादा जी को पढ़कर सुनाता है तो क्या स्थिति होगी इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।

मोबाइल कंपनियों से इस तरह के जो काल आ रहे हैं उनमें कभी-कभी बिल्कुल ही उन्मुक्त अंदाज में लड़कियां कुछ इस तरह से बात करती हैं कि मानो..। दफ्तर जाने और लौटने के समय इस तरह के काल खूब आते हैं। जैसे ही मोबाइल की घंटी बजी कि आप रुक गए। भले ही देर क्यूं न हो जाए। आपने हलो बोला तो आधे सेकेंड के बाद उधर से आवाज आती है।

लवमीटर क्या बला है इस बारे में अब तक शायद ही किसी को पता हो पर मोबाइल कंपनियां आपको यह बता रही हैं कि आप अपने नाम और अपनी चहेती के नाम एसएमएस करें। हम लवमीटर पर उसे जांचकर बता देंगे किस स्तर का है आपका प्यार?..आप दिखना चाहते हैं स्लिम एंड ट्रिम तो फिर अपना ब्लड ग्रुप हमें भेजिए हम बताएंगे आपको आपके ब्लड ग्रुप के हिसाब से वह आहार जो आपको स्लिम बना देगा।

प्यार, इश्क और नानवेज जोक के लिए निमंत्रण के साथ-साथ अब आपकी गाय आपके पड़ोसी की गाय से अधिक दूध कैसे दे इस बात की गारंटी के लिए भी एसएमएस करने को आमंत्रित किया जा रहा है !!

 

टी आर पी की दौड़ में हारे क्विज शो: सिद्धार्थ बासु


एक ऐसा समय था जब रविवार के दिन बच्चे टेलीविजन पर अपने क्विज शो का बेसब्री से इंतजार करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होता। विभिन्न चैनलों के बीच चल रहा टीआरपी युद्ध और दर्शकों की गीत, नृत्य और रियलिटी शो की मांग ने भारतीय टेलीविजन के पर्दे से ज्ञान-आधारित कार्यक्रमों को गायब कर दिया है। अब अभिभावक शिकायत कर रहे हैं।

दो किशोर बच्चों की मां संगीता अग्रवाल कहती हैं, पहले सास-बहु के धारावाहिक चलते थे। अब ग्रामीण परिवेश पर आधारित शो या बिग बॉस जैसे रियलिटी शो चल रहे हैं। मैं अपने बच्चों को क्या देखने दूं।

अग्रवाल कहती हैं कि पहले वह प्रत्येक रविवार को बॉर्नवीटा क्विज कांटेस्ट का इंतजार करती थीं लेकिन अब हिंसात्मक और संवेदनहीन शो उन्हें छोटे पर्दे से दूर रखते हैं।

भारत में क्विज व खेलों से संबंधित रियलिटी कार्यक्रमों के प्रस्तोताओं में से एक सिद्धार्थ बासु कहते हैं कि क्विज शो प्रसारित न होने का सबसे सामान्य कारण टीआरपी की दौड़ है।

बासु ने कहा, ज्ञान-आधारित शो और अंग्रेजी भाषा के कार्यक्रम मुश्किल से ही टीआरपी की सूची में दिखते हैं। इसलिए जब तक एक क्विज शो का प्रसारकों या विज्ञापनदाताओं के साथ गठबंधन नहीं होता तब तक ये शो विलुप्त प्रजाति के कार्यक्रम बने रहेंगे। बॉर्नवीटा क्विज कांटेस्ट, क्विज टाइम, स्पैक्ट्रम, द इंडिया क्विज, मास्टरमाइंड इंडिया, यूनीवर्सिटी चैलेंज, कौन बनेगा करोड़पति और इंडियाज चाइल्ड जीनियस जैसे कार्यक्रम पहले टेलीविजन पर प्रसारित होते थे लेकिन अब इस तरह के कार्यक्रम कहीं भी दिखाई नहीं देते।

बासु सलाह देते हैं, यदि बच्चों को ज्ञान के क्षेत्र में मूल्यों की जरूरत है, तो मैं कहूंगा कि वह टेलीविजन कम देखें या चुनिंदा कार्यक्रम ही देखें।

 

महारष्ट्र में मीडिया कर्मिओं पर हमले पर मैनपुरी की मीडिया ने फूंका ठाकरे का पुतला

पुतला फुकने जाते मैनपुरी के मीडिया कर्मी

ठाकरे के पुतले पर विरोध जताते मीडिया कर्मी

शिव सैनिकों की और से महाराष्ट्र में मीडिया पर किये गए हमले का मैनपुरी के मीडिया ने पुरजोर तरीके से विरोध किया.इस घटना को लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक बताते हुए शिव सैनकों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है.दैनिक जागरण.राष्ट्रीय सहारा.अमरउजाला.दैनिक हिन्दुस्तान.डीएलए और बुराभाला ब्लॉग के मीडिया कर्मियों ने बाला साहब का पुतला जला कर नारेबाजी की.इस मोके पर विरिष्ठ पत्रकार खुशीराम यादव ने शिवसैनिकों की इस हरकत की कड़े शब्दों में भर्त्सना की.दैनिक जागरण के संवादाता राकेश रागी ने मनसे और शिवसेना को प्रतिवंधित करने की मांग की.राष्ट्रिय सहारा के सिटी चीफ अगम चौहान ने कहा कि भाषा और प्रदेश के नाम पर जनभावनाओं को भडकाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाये.सत्यम चेनल ने इस घटना के विरोध में काली पट्टी बांध कर दफ्तर में काम किया.चेनल के सम्पादक हृदेश सिंह ने कहा कि देश कि जनता को भी एक जुट होकर ऐसे लोगों का विरोध करना चाहिए.बुरा भला ब्लॉग के सम्पादक शिवम् मिश्र ने भी इस घटना को गलत बताया.इस मोके पर सुबोध तिवारी.चेतन चतुर्वेदी.विशाल शर्मा.मुकेश कश्यप.नेहा सिंह.अमित उपाध्याय.कोशल यादव.पंकज चौहान.आशीष दीक्षित.प्रगति चौहान गौरव सहित कई मीडिया कर्मी मौजूद रहे.

 

राजनीतिक अवसरवादिता – अब बस भी करो !!

उत्तर प्रदेश के दो बड़े नेता मुलायम सिंह और कल्याण सिंह जिस तरह यकायक एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए उससे उनकी राजनीतिक अवसरवादिता का ही पता चलता है। अब इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि मुलायम सिंह ने जब यह समझा कि कल्याण सिंह उनके वोट बढ़ाने का काम कर सकते हैं तब उन्होंने उन्हें गले लगा लिया और जब यह समझ आया कि उनका साथ महंगा पड़ा तो दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंका। कल्याण सिंह से तौबा करने के संदर्भ में मुलायम सिंह की इस सफाई का कोई मूल्य नहीं कि वह तो उनकी पार्टी में थे ही नहीं और उन्हें आगरा अधिवेशन का निमंत्रण पत्र गलती से चला गया था। एक तो कल्याण सिंह के स्पष्टीकरण से यह साफ हो गया कि मुलायम सिंह की यह सफाई सही नहीं और दूसरे यह किसी से छिपा नहीं कि आगरा अधिवेशन में सपा ने उन्हें किस तरह हाथोंहाथ लिया था। कल्याण सिंह ने भले ही सपा की विधिवत सदस्यता ग्रहण न की हो, लेकिन वह पार्टी के एक नेता की तरह ही मुलायम सिंह के पक्ष में खड़े रहे और उनकी ही तरह भाजपा को नष्ट करने का संकल्प लेते रहे। यह बात और है कि सपा को उनका साथ रास नहीं आया और पिछड़े वर्गो का एकजुट होना तो दूर रहा, मुलायम सिंह के परंपरागत वोट बैंक में भी सेंध लग गई। यह आश्चर्यजनक है कि सपा नेताओं ने यह समझने से इनकार किया कि कल्याण सिंह से नजदीकी मुस्लिम वोट बैंक की नाराजगी का कारण बन सकती है।

इसमें संदेह है कि सपा के कल्याण सिंह से हाथ जोड़ने के बाद मुस्लिम वोट बैंक फिर से उसकी ओर लौट आएगा। इसमें भी संदेह है कि एक तरह से सपा से निकाल बाहर किए गए कल्याण सिंह का भाजपा में स्वागत किया जाएगा। जिस तरह मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को गले लगाकर अपनी विश्वसनीयता को क्षति पहुंचाई उसी तरह कल्याण सिंह भी अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। फिलहाल यह कहना कठिन है कि उनकी भाजपा में पुन: वापसी हो पाएगी या नहीं, लेकिन यह लगभग तय है कि उनकी वापसी का भाजपा को कोई लाभ नहीं मिलने वाला। कल्याण सिंह भले ही प्रायश्चित के रूप में भाजपा को मजबूत करने की बात कह रहे हों, लेकिन आम जनता यह कैसे भूल सकती है कि वह कल तक भाजपा को मिटा देने का संकल्प व्यक्त कर रहे थे? सवाल यह भी है कि आखिर उन्हें प्रायश्चित के कितने मौके किए जाएंगे? राजनीतिक स्वार्थो के लिए किसी भी हद तक जाने की एक सीमा होती है। यह निराशाजनक है कि कद्दावर नेता होते हुए भी मुलायम सिंह और कल्याण सिंह, दोनों ने इस सीमा का उल्लंघन करने में संकोच नहीं किया। वोट बैंक के रूप में ही सही आम जनता इतना तो समझती ही है कि राजनेता किस तरह उसके साथ छल करते हैं। वोट बैंक निश्चित ही बैंक खातों में जमा धनराशि नहीं कि उसे मनचाहे तरीके से दूसरे के खाते में स्थानांतरित किया जा सके। मुलायम सिंह और कल्याण सिंह का हश्र यह बता रहा है कि वोटों के लिए कुछ भी कर गुजरने और यहां तक कि आम जनता की भावनाओं से खेलने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं।

 

कौन लिख रहा है इन नौनिहालों की तकदीर ??

अगर वास्तव में बच्चे किसी देश का भविष्य है तो भारत का भविष्य अंधकारमय है। भविष्य का भारत अनपढ़, दुर्बल और लाचार है। कोई भी इनका अपहरण, अंग-भंग, यौन शोषण कर सकता है और बंधुआ बना सकता है।

हर साल बच्चों के प्रिय चाचा जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। बच्चों के लिए कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। बड़ी-बड़ी बातें की जाती है, लेकिन साल-दर-साल उनकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।

भारत में बाल-मजदूरी पर प्रतिबंध लगे 23 साल हो गए है, लेकिन विश्व में सबसे ज्यादा बाल मजदूर यहीं हैं। इनकी संख्या करीब छह करोड़ है। खदानों, कारखानों, चाय बागानों, होटलों, ढाबों, दुकानों आदि हर जगह इन्हें कमरतोड़ मेहनत करते हुए देखा जा सकता है। कच्ची उम्र में काम के बोझ ने इनके चेहरे से मासूमियत नोंच ली है।

इनमें से अधिकतर बच्चे शिक्षा से दूर खतरनाक और विपरीत स्थितियों में काम कर रहे है। उन्हें हिंसा और शोषण का सामना करना पड़ता है। इनमें से कई तो मानसिक बीमारियों के भी शिकार हो जाते हैं। बचपन खो करके भी इन्हे ढग से मजदूरी नहीं मिलती।

भारत में अशिक्षा, बेरोजगारी और असंतुलित विकास के कारण बच्चों से उनका बचपन छीनकर काम की भट्ठी में झोंक दिया जाता है। इसलिए जब तक इन समस्याओं का हल नहीं किया जाएगा, तब तक बाल श्रम को रोकना असंभव है। ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि सभी बच्चों को मुफ्त और बेहतर शिक्षा मिल सके। हर परिवार को कम से कम रोजगार, भोजन और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों। साथ ही बाल-मजदूरी से जुड़े सभी कानून और सामाजिक-कल्याण की योजनाएं कारगर ढंग से लागू हों।

देश में बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। ब्रिटेन की एक संस्था के सर्वे के अनुसार पूरी दुनिया में जितने कुपोषित बच्चे हैं, उनकी एक तिहाई संख्या भारत में है। यहा तीन साल तक के कम से कम 46 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इसके अलावा प्रतिदिन औसतन 6,000 बच्चों की मौत होती है। इनमें 2,000 से लेकर 3,000 बच्चों की मौत कुपोषण के कारण होती है।

भारत में बच्चों का गायब होना भी एक बड़ी समस्या है। इनमें से अधिकतर बच्चों को संगठित गिरोहों द्वारा चुराया जाता है। ये गिरोह इन मासूमों से भीख मंगवाते हैं। अब तो मासूम बच्चों से छोटे-मोटे अपराध भी कराए जाने लगे है। पिछले एक साल में दिल्ली मे दो हजार से ज्यादा बच्चे गायब हुए। इन्हें कभी तलाश ही नहीं किया गया, क्योंकि ये सभी बच्चे बेहद गरीब घरों के थे।

यह स्थिति तो देश की राजधानी दिल्ली की है। पूरे देश की क्या स्थिति होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। अगर गायब होने वाला बच्चा समृद्ध परिवार का होता है तो शासन और प्रशासन में ऊपर से लेकर नीचे तक हड़कंप मच जाता है।

यदि बच्चा गरीब घर से ताल्लुक रखता है तो पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती। पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई थी कि वह सिर्फ अमीरों के बच्चों को तलाशने में तत्परता दिखाती है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 80 प्रतिशत पुलिस वाले गुमशुदा बच्चों की तलाश में रुचि नहीं लेते। भारत में हर साल लगभग 45 हजार बच्चे गायब होते हैं और इनमें से 11 हजार बच्चे कभी नहीं मिलते।

संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव में 2007 मे भारत में बाल अधिकार संरक्षण आयोग गठित किया गया था। आयोग ने गुमशुदा बच्चों के मामले मे राच्य सरकारों को कई सुझाव और निर्देश दिए थे। इनमें से एक गुम होने वाले हर बच्चे की एफआईआर तुरंत दर्ज किए जाने के संदर्भ में था, लेकिन सच्चाई सबके सामने है।

बाल विवाह एक और बड़ी समस्या है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में जिन लड़कियों की बचपन में शादी कर दी जाती है, उनमें एक तिहाई से भी ज्यादा भारत से हैं। सालभर में लाखों बच्चिया इसके लिए अभिशप्त है। इन्हें भीषण शारीरिक और मानसिक यातना झेलनी पड़ती है।

बाल विवाह पर प्रतिबंध के बावजूद रीति-रिवाज, पिछड़ेपन ओर रूढि़वादिता के कारण अब भी देश के कई हिस्सों में लड़कियों को विकास का अवसर दिए बिना अंधे कुंए में धकेला जा रहा है। छोटी उम्र में विवाह से कई बार लड़कियों को बाल वैधव्य का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका जीवन मुसीबतों से घिर जाता है।

इसके अलावा बाल विवाह से कई बार वर-वधू के शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक विकास में विपरीत असर पड़ता है। बाल विवाह के कारण लड़कियों की पढ़ाई रुक जाती है। कम पढ़ी-लिखी महिला अंधविश्वासों और रूढि़यों से घिर जाती है। ऐसी पीढ़ी से देश व समाज हित की क्या उम्मीद की जा सकती है?

इससे दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि करीब 53 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण के शिकार हैं। इनमें केवल लड़किया ही नहीं, बल्कि लड़के भी हैं। पाच साल से 12 साल की उम्र के बीच यौन शोषण के शिकार होने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक है।

कुल मिलाकर कहा जाए तो बच्चों के मामले में भारत की स्थिति सबसे खराब है। प्रशासनिक अधिकारियों को इस तरह की कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती कि वह बच्चों के प्रति संवेदशनील होकर अपने दायित्व को समझें। बच्चे वोट बैंक नहीं होते इसलिए राजनीतिक पार्टिया दिखावे के लिए भी उनकी चिंता नहीं करतीं। सब बातें छोड़ भी दें तो सरकार बच्चों के लिए बेसिक शिक्षा तक नहीं उपलब्ध करवा पा रही है।

पूरे देश में स्कूलों का अब भी अभाव है। जहा स्कूल है भी, वहा कुव्यवस्था है। कहीं अध्यापकों की कमी है तो कहीं जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। 10 सितंबर को दिल्ली के खजूरी खास स्थित राजकीय वरिष्ठ बाल/बालिका विद्यालय में परीक्षा से पूर्व मची भगदड़ में पाच छात्रों की मौत हो गई थी, जबकि 32 छात्राएं घायल हुई थीं। इसके पीछे मुख्य वजह कुव्यवस्था थी। यह स्थिति देश की राजधानी की है। इससे पता चलता है कि हम देश के भविष्य के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्य संध्या बजाज का कहना है कि गुमशुदा बच्चों के अधिकाश मामलों में रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती। गुम होने वाले ज्यादातर बच्चे शोषण का शिकार होते है। इसलिए हर गुमशुदा बच्चे की रिपोर्ट जरूर दर्ज की जानी चाहिए। बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिलने से उनकी जिदंगी और बेहतर बन जाएगी।

हम उनसे सबक क्यों नहीं लेते

कई देशों में बच्चों के लिए अलग से लोकपाल नियुक्त हैं। सबसे पहले नार्वे ने 1981 में बाल अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक अधिकारों से युक्त लोकपाल की नियुक्ति की। बाद में आस्ट्रेलिया, कोस्टारिका, स्वीडन [1993], स्पेन [1996], फिनलैंड आदि देशों ने भी बच्चों के लिए लोकपाल की नियुक्ति की।

लोकपाल का कर्तव्य है बाल अधिकार आयोग के अनुसार बच्चों के अधिकारों को बढ़ावा देना और उनके हितों का समर्थन करना। यही नहीं, निजी और सार्वजनिक प्राधिकारियों में बाल अधिकारों के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करना भी उनके दायित्वों में है। कुछ देशों में तो लोकपाल सार्वजनिक विमर्शो में भाग लेकर जनता की अभिरुचि बाल अधिकारों के प्रति बढ़ाते हैं और जनता व नीति निर्धारकों के रवैये को प्रभावित करते हैं।

बच्चों के शोषण एवं बालश्रम की समस्याओं के मद्देनजर भारत में भी बच्चों के लिए स्वतंत्र लोकपाल व्यवस्था गठित करने की मांग अक्सर की जाती रही है, लेकिन सवाल यह है कि इतने संवैधानिक उपबंधों, नियमों-कानूनों, मंत्रालयों और आयोगों के बावजूद अगर बच्चों के अधिकारों का हनन हो रहा है तो समाज भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।

कल हर बच्चा अपनी पुरानी पीढ़ी से मांगेगा हिसाब

हर साल की तरह फिर से 14 नवंबर यानी बाल दिवस आ गया। हर साल की तरह बच्चों के मसीहा चाचा नेहरु को याद करने का दिन। बच्चों को देश का भविष्य और कर्णधार बताने, उनकी तरक्की और शिक्षा के नए वायदे करने, स्कूली बच्चों के बीच कार्यक्रम करके नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षा-व्यापारियों के फोटो खिंचवाने और अखबार में खबर छपवाने का दिन।

आखिर कब तक हमारा देश अपने आपको और उन मासूम बच्चों को धोखा देता रहेगा, जिन्हें अब तक वह भरपेट रोटी और आजादी जैसी बुनियादी चीजें भी मुहैया नहीं करा सका। शिक्षा, स्वास्थ्य, बचपन का स्वाभिमान और भविष्य की गारंटी तो दूर की बात है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में पांच वर्ष से कम आयु के 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हाल ही में यूनीसेफ ने खुलासा किया है था कि दुनिया भर में पाच साल से कम उम्र में मौत के मुंह में समा जाने वाले लगभग 97 लाख बच्चों में से 21 लाख भारत के होते हैं। कम वजन के पैदा होने वाले साढ़े पंद्रह करोड़ शिशुओं में से साढ़े पाच करोड़ हमारे देश के होते हैं।

पाच से छह करोड़ बच्चे बाल मजदूरी के शिकार हैं। लाखों बच्चे जानवरों से भी कम कीमत में एक से दूसरी जगह खरीदे और बेचे जाते हैं। 40-50 हजार बच्चे मोबाइल फोन, बटुए, खिलौने या किसी सामान की तरह हर साल गायब कर दिए जाते हैं। अकेले देश की राजधानी दिल्ली में हर रोज औसतन छह बच्चे गायब किए जाते हैं। सड़कों पर जबरिया भीख मंगवाने के लिए अंधा बनाकर या हाथ-पाव काटने की कहानी स्लमडाग मिलियनायर की कल्पना नहीं, बल्कि रोजमर्रा की असलियत है।

शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब किसी मासूम बच्ची से बलात्कार करने या उसकी हत्या कर देने की घटनाएं अखबारों में देखने को न मिलती हों। घरेलू बाल मजदूरी रोकने के लिए दो साल पहले एक कठोर कानूनी प्रावधान लाया गया था, लेकिन कभी किसी अदाकारा के घर तो कभी सरकारी अधिकारी और तथाकथित मध्यवर्गीय शिक्षित व्यवसायी के घर घरेलू बाल नौकरानियों को गर्म लोहे से दाग देने या बुरी तरह मारपीट करने की घिनौनी वारदातें आए दिन सामने आती हैं। मीडिया में थोड़ा बहुत शोर शराबा हो जाता है। अधिकारियों और स्वयंसेवी संगठनों के नेताओं के बाइट किसी चैनल में एक दो दिन चल जाते हैं और फिर वही ढाक के तीन पात।

बाल दिवस की रस्म अदायगी करने से पहले हमें अपने अंदर झाकना चाहिए। निजी सार्वजनिक और राजनैतिक ईमानदारी की भी जाच पड़ताल करनी चाहिए। अपनी खुद की संतानों के भविष्य को संवारने के लिए जो लोग घूसखोरी और भ्रष्टाचार तक में लिप्त पाए जाते हैं, वे दूसरों के बच्चों को गुलाम बनाने से नहीं कतराते। अपने बच्चों को महंगे से महंगे अंग्रेजी स्कूलों में दाखिल कराने के लिए जमीन-आसमान एक कर देते हैं, लेकिन किसी चाय के ढाबे पर बेशर्मी से बच्चे के हाथ की चाय पीते हुए या जूते पालिश कराते हुए उन्हें यह एहसास तक नहीं होता कि भारत का भविष्य सिर्फ उनके बाल-गोपाल ही नहीं, दूसरे बच्चे भी हैं।

सार्वजनिक जीवन में दोहरे मानदंड की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि नेता-अधिकारी और अधिकारों की बात करने वाले बुद्धिजीवी कुतर्को का अंबार लगा देते हैं। मसलन, गरीब का बच्चा काम नहीं करेगा तो भूखा मर जाएगा या लड़की वेश्यावृत्ति करने लगेगी, इसलिए बेहतर है कि वह बाल मजदूरी करे। कुछ लोग कहते हैं कि देश के पास इतने संसाधन कहा कि हर बच्चे का गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई मुहैया कराई जा सके। यदि गरीब बच्चों को मंहगे अंग्रेजी स्कूलों में जबरन भर्ती कराया जाएगा तो वहा शिक्षा का स्तर खराब हो जाएगा आदि।

आखिर हम कब तक बच्चों के वर्तामन और भविष्य के साथ पाखंड करते रहेंगे? कब तक उनको धोखा देते रहेंगे? यह सच है कि अधिकाश बच्चे आज अपने आकाओं से जवाब मागने का माद्दा नहीं रखते, लेकिन आने वाले कल की असलियत आज से एकदम अलग होगी यह तय समझिए। सदियों से चले आ रहे पाखंड और बचपन विरोधी परंपराओं को कुछ बच्चों ने चुनौती देना शुरू कर दिया है। यह सैलाब रुकने वाला नहीं हैं। कल हर बच्चा अपनी पुरानी पीढ़ी से हिसाब जरूर मागेगा, तब हम उन्हें क्या जवाब देंगे?

– अनुराग [लेखक सुपरिचित सामाजिक कार्यकर्ता हैं]

 

दिमाग को चुस्त बनाती है हिंदी !!

दिमाग को चुस्त बनाती है हिंदी !!

यदि आप हिंदी भाषी हैं और आधुनिक सभ्यता के शौकीन होकर बिना जरुरत अंग्रेजी बोलने की लत पाल चुके हैं तो जरा सावधान हो जाइए। देश के वैज्ञानिकों ने कहा है कि अंग्रेजी की तुलना में हिंदी भाषा बोलने से मस्तिष्क अधिक चुस्त-दुरुस्त रहता है।

राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र के डॉक्टरों ने एक अनुसंधान के बाद कहा है कि हिंदीभाषी लोगों के लिए मस्तिष्क को चुस्त-दुरुस्त रखने का सबसे बढि़या तरीका यही है कि वे अपनी बातचीत में अधिक से अधिक हिंदी भाषा का इस्तेमाल करें और अंग्रेजी का इस्तेमाल जरुरत पड़ने पर ही करें। विज्ञान पत्रिका ‘करंट साइंस’ में प्रकाशित अनुसंधान के पूरे ब्यौरे में मस्तिष्क विशेषज्ञों का कहना है कि अंग्रेजी बोलते समय दिमाग का सिर्फ बायां हिस्सा सक्रिय रहता है, जबकि हिन्दी बोलते समय मस्तिष्क का दायां और बायां, दोनों हिस्से सक्रिय हो जाते हैं जिससे दिमागी स्वास्थ्य तरोताजा रहता है।

राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र की भविष्य में अन्य भारतीय भाषाओं के प्रभाव पर भी अध्ययन करने की योजना है। अनुसंधान से जुड़ी डाक्टर नंदिनी सिंह के अनुसार मस्तिष्क पर अंग्रेजी और हिंदी भाषा के प्रभाव का असर जानने के लिए छात्रों के एक समूह को लेकर अनुसंधान किया गया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र द्वारा कराए गए इस अध्ययन के पहले चरण में छात्रों से अंग्रेजी में जोर जोर से बोलने को कहा गया और फिर हिंदी में बात करने को कहा गया।

इस समूची प्रक्रिया में दिमाग का एमआरआई किया जाता रहा। नंदिनी के अनुसार मस्तिष्क के परीक्षण से पता चला है कि अंग्रेजी बोलते समय छात्रों के दिमाग का सिर्फ बायां हिस्सा सक्रिय था, जबकि हिंदी बोलते समय दिमाग के दोनों हिस्से [बाएं और दाएं] सक्रिय हो उठे। अनुसंधान टीम का कहना है कि ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अंग्रेजी एक लाइन में सीधी पढ़ी जाने वाली भाषा है, जबकि हिंदी के शब्दों में ऊपर-नीचे और बाएं-दाएं लगी मात्राओं के कारण दिमाग को इसे पढ़ने में अधिक कसरत करनी पड़ती है जिससे इसका दायां हिस्सा भी सक्रिय हो उठता है।

इन डाक्टरों की राय है कि हिंदीभाषियों को बातचीत में ज्यादातर अपनी भाषा का इस्तेमाल ही करना चाहिए और अंग्रेजी को जरुरत पड़ने पर संपर्क भाषा के रूप में। इस अनुसंधान के परिणामों पर जाने माने मनोचिकित्सक डा. समीर पारेख ने कहा कि ऐसा संभव है। उनका कहना है कि हिंदी की जिस तरह की वर्णमाला है, उसके मस्तिष्क को कई फायदे हैं।

 

एक ही कंठ में आयत और श्लोक

डा. अल्लामा इकबाल ने कहा था, मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना लेकिन फिर भी लोग भाषा और मजहबी झगड़ों में उलझे हैं। दूसरी ओर, शिक्षा का एक मंदिर ऐसा भी है, जहा न तो धर्म की दीवारें हैं और न जुबान की बंदिश। यहा के 40 मुस्लिम बच्चों के कंठ में कुरान-ए-पाक की आयतों की जितनी रवानी है, उतनी ही संस्कृत के गूढ़ मंत्रों की भी। खास बात यह है कि इस विद्यालय के प्रबंधक भी मुसलमान हैं। यह पहल साप्रदायिक सौहार्द और अमन पसंदी का बेमिसाल नमूना तो है ही, खुशहाल सरजमीं पर नफरत की फसल उगाने की तमन्ना रखने वालों को एक सबक भी है।

दकियानूसी विचारधारा के लोग आज भी उर्दू को मुसलमानों की तथा संस्कृत को हिंदुओं की जुबान मानते हैं। शहर से तीन किमी दूर किला रोड स्थित गाव अब्दुल्लापुर के सनबीम इंटर कालेज में इस संवाददाता के पहुंचने पर सातवीं कक्षा की सानिया नकवी कहती है-भवता स्वागतम् [आपका स्वागत है]। दूसरी छात्रा फरमान तुरंत बोली, श्रीमन भवान कुत्र आगतवान । संस्था संस्कृत भारती के प्रयास से 40 मुस्लिम छात्र देववाणी में पारंगत हो चुके हैं।

संस्कृत क्यों सीखी है? सानिया कहती है, भाषा पर हिंदू, मुसलमान किसी का अधिकार नहीं है। जिसे ज्ञान है, भाषा उसी की होती है। सीखने के बाद वह संस्कृत का प्रचार-प्रसार करेंगी और संस्कृत की शिक्षिका बनना चाहेंगी। इसी सवाल पर फरमान का जवाब था, संस्कृत में हर विधा का ज्ञान है, लिहाजा ऐसी भाषा सीखने में हर्ज क्या है। विद्यालय प्रबंधक तैयब अली की बेटी सोनी खान तो विद्यालय में शिक्षकों को नमस्कार के बजाय नमो नमाय बोलती है। वह तो घर में भी भाई-बहनों से संस्कृत में वार्तालाप करती है।

दसवीं की शाइस्ता कहती है कि उसके भाई हसीन पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन उसने उन्हें भी संस्कृत के कुछ वाक्य सिखाए हैं। सातवीं कक्षा की सबीना जैदी ने खुद सीखने के साथ अपनी बहन शाइस्ता को भी संस्कृत सिखाई है। सबीना संस्कृत में एमए करके संस्कृत शिक्षिका बनने की ख्वाहिशमंद है। वसुधैव कुटुंबकम के श्लोक सुनाने वाले सलमान को देखकर संस्कृत का प्रकाड ज्ञानी का एहसास होता है। अजहरुद्दीन सैफी, बुशरा समेत अन्य बच्चे भी इसी प्रवाह में संस्कृत बोलते हैं। फरमान और सबीना को लघु नाटिका अतिथि देवो भव: का मंचन करते देखकर इनके धर्म और भाषाई दीवारों से ऊपर होने का खुद-ब-खुद एहसास हो जाता है।

उधर, विद्यालय प्रबंधक तैय्यब अली कहते हैं कि संस्कृत ही संस्कृति के विकास का आधार है। यदि बच्चे संस्कृत में कैरियर बनाएं, तो उनके लिए खुशी की बात है। संस्कृत भारती के जिला संयोजक मनोज कुमार का कहना हैं कि उनका प्रयास इनमें से कुछ बच्चों को संस्कृत की उच्च शिक्षा दिलाने का है। संस्कृत भारती के पश्चिम यूपी अध्यक्ष और मेरठ कालेज में संस्कृत रीडर डा. वाचस्पति कहते हैं कि संस्कृत विश्व की भाषा थी। बच्चों की यह ललक तारीफ के काबिल है।

 
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Posted by on नवम्बर 12, 2009 में बात मेरे दिल की