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Category Archives: दीपावली

मुगल सल्तनत की दीवाली

मुगल सल्तनत का काल भारतीय इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुगल बादशाह अपने साथ यहां इस्लामी संस्कृति को लाए, किन्तु यह भी कैसे मुमकिन था कि इस महान राष्ट्र की सदियों पुरानी संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों से वे अप्रभावित रह पाते?
दीवाली सदियों से हिंदू संस्कृति का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता रहा है। प्रकाश की जगमग और उल्लास भरे इस पर्व ने मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर को भी आकर्षित किया। बाबर ने दीवाली के त्योहार को ‘एक खुशी का मौका’ के तौर पर मान्यता प्रदान की।
बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को भी दीवाली के जश्न में शामिल होने की प्रेरणा दी। बाबर के उत्तराधिकारी के रूप में हुमायूं ने इस परंपरा को न केवल अक्षुण्ण रखा, अपितु इसे व्यक्तिगत रुचि से और आगे बढ़ाया। हुमायूं के शासन-काल में दीवाली के मौके पर पूरे राजमहल को झिलमिलाते दीपों से सजाया जाता था और आतिशबाजी की जाती थी। हुमायूं खुद दीवाली उत्सव में शरीक होकर शहर में रोशनी देखने निकला करते थे। हुमायूं – ‘तुलादान’ की हिंदू परंपरा में भी रुचि रखते थे।
मुगल-सल्तनत के तीसरे उत्तराधिकारी को इतिहास अकबर महान के नाम से जानता है। अकबर द्वारा सभी हिन्दू त्योहारों को पूर्ण मनोयोग और उल्लास के साथ राजकीय तौर पर मनाया जाता था। दीवाली अकबर का खास पसंदीदा त्योहार था। अबुल फजल द्वारा लिखित आईने अकबरी में उल्लेख मिलता है कि दीवाली के दिन किले के महलों व शहर के चप्पे-चप्पे पर घी के दीपक जलाए जाते थे। अकबर के दौलतखाने के बाहर एक चालीस गज का दीपस्तंभ टांगा जाता था, जिस पर विशाल दीपज्योति प्रज्जवलित की जाती थी। इसे ‘आकाशदीप’ के नाम से पुकारा जाता था। दीवाली के अगले दिन सम्राट अकबर गोवर्धन पूजा में शिरकत करते थे। इस दिन वह हिन्दू वेशभूषा धारण करते तथा सुंदर रंगों और विभिन्न आभूषणों से सजी गायों का मुआयना कर ग्वालों को ईनाम देते थे।
अकबर के बाद मुगल सल्तनत की दीवाली परंपरा उतनी मजबूत न रही, मगर फिर भी अकबर के वारिस जहांगीर ने दीवाली को राजदरबार में मनाना जारी रखा। जहांगीर दीवाली के दिन को शुभ मानकर चौसर अवश्य खेला करते थे। राजमहल और निवास को विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता था और जहांगीर रात्रि के समय अपनी बेगम के साथ आतिशबाजी का आनंद लेते थे।
शाहजहां और उनके बेटे दारा शिकोह ने भी दीवाली परंपरा को जीवित रखा। शाहजहां और दारा शिकोह इस त्योहार को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाते और अपने नौकरों को बख्शीश बांटते थे। उनकी शाही सवारी रात्रि के समय शहर की रोशनी देखने निकलती थी।

आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर का दीवाली मनाने का निराला ही अंदाज था। जफर की दीवाली तीन दिन पहले ही शुरू हो जाती थी। दीवाली के दिन वे तराजू के एक पलड़े में बैठते और दूसरा पलड़ा सोने-चांदी से भर दिया जाता था। तुलादान के बाद यह सब गरीबों को दान कर दिया जाता था। तुलादान की रस्म-अदायगी के बाद किले पर रोशनी की जाती थी। कहार खील-बतीशे, खांड और मिट्टी के खिलौने घर-घर जाकर बांटते। गोवर्धन पूजा के दिन नागरिक अपने गाय-बैलों को मेंहदी लगाकर और उनके गले में शंख और घुंघरू बांधकर जफर के सामने पेश करते। जफर उन्हे इनाम देते व मिठाई खिलाते थे।

 
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Posted by on अक्टूबर 18, 2009 in दीपावली, मुगल

 

कुछ आसपास की – दिवाली के अगले दिन छिड़ेगा हिंगोटा युद्ध

मध्यप्रदेश के इंदौर जिले में गौतमपुरा और रुणजी गांवों के जांबाज लड़ाके ‘हिंगोट युद्ध’ की सदियों पुरानी परंपरा निभाने के लिए सावधान की मुद्रा में आते दिख रहे हैं।
यह रिवायती जंग दिवाली के अगले दिन यानी विक्रम संवत की कार्तिक शुक्ल प्रथमा को यहां से 55 किलोमीटर दूर गौतमपुरा में छिड़ती है। इसमें एक खास किस्म के हथियार ‘हिंगोट’ को दुश्मनों पर दागा जाता है। हिंगोट दरअसल एक जंगली फल है, जो हिंगोरिया नाम के पेड़ पर लगता है। आंवले के आकार वाले फल से गूदा निकालकर इसे खोखला कर लिया जाता है। इसके बाद इसमें कुछ इस तरह से बारुद भरी जाती है कि आग दिखाने पर यह किसी अग्निबाण की तरह सर्र से निकल पड़ता है। इसे देसी ग्रेनेड के नाम से भी जाना जाता है।
हिंगोट युद्ध गौतमपुरा और रुणजी के लड़ाकों के बीच सदियों से होता आ रहा है। गौतमपुरा के योद्धाओं के दल को ‘तुर्रा’ नाम दिया जाता है, जबकि रुणजी गांव के लड़ाके ‘कलंगी’ दल की ओर से हिंगोट युद्ध की कमान संभालते हैं। फिजा में बिखरे त्योहारी रंगों और पारंपरिक उल्लास के बीच कार्तिक शुक्ल प्रथमा को सूरज ढलते ही हिंगोट युद्ध का बिगुल बज उठता है। इस अनोखी जंग के गवाह बनने के लिए हजारों दर्शक दूर-दूर से गौतमपुरा पहुंचते हैं।

इस जंग में ‘कलंगी’ और ‘तुर्रा’ दल के या एक-दूसरे पर कहर बनकर टूटने के उत्साह से सराबोर और हिंगोट व ढाल से लैस होते हैं। गौतमपुरा नगर पंचायत के अध्यक्ष विशाल राठी ने बताया कि हिंगोट युद्ध धार्मिक आस्था और शौर्य प्रदर्शन, दोनों से जुड़ा है। इसमें जीत-हार के अपने मायने हैं। उन्होंने कहा कि इस बार भी हिंगोट युद्ध में कलगी और तुर्रा दल के बीच रोचक टकराव होने के आसार हैं। दोनों दलों के योद्धा महीनों से भिड़ंत की तैयारी कर रहे हैं। राठी ने कहा कि धार्मिक आस्था के मद्देनजर हिंगोट युद्ध में पुलिस और प्रशासन रोड़े नहीं अटकाते, बल्कि ‘रणभूमि’ के आस-पास दर्शकों की सुरक्षा व घायलों के इलाज का इंतजाम करते हैं।

 

याद-ए-वतन आती है दूर तक समझाने को….

एक शायर ने लिखा है कि ‘हमने जब वादी ए गुरबत में कदम रखा था, दूर तक याद ए वतन आई थी समझाने को’..कुछ ऐसा ही हाल उन भारतीयों का भी होता है जो परदेश में जा बसे हैं और अपनी पेशेवराना जिम्मेदारियों के चलते दीपावली जैसे बड़े त्योहार पर वतन नहीं आ पाते। इसके बाद भी वह दूसरे देश की सरजमीं पर पूरे जोश के साथ त्योहार मनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन ऐसे कुछ देश हैं जहां प्रवासी भारतीयों की संख्या काफी ज्यादा है। इन देशों में भारतीयों के अपने-अपने आस्था स्थल भी हैं जहां लोग इकट्ठा होकर त्योहार के दौरान वतन में होने जैसा अहसास पाते हैं।
कनाडा निवासी गुरमनजोत कौर ने कहा कि दीपावली पर अपने देश की याद सबसे ज्यादा आती है लेकिन ऐसे में दिल को समझाने का तरीका यही होता है कि आप विदेश में भी रहते हुए अपने त्योहार को धूमधाम से मनाएं। उन्होंने कहा कि कनाडा और खासकर टोरंटो में हिंदुओं के मुकाबले सिखों की तादाद काफी है लेकिन फिर भी दीपावली पर यहां उत्सवी माहौल कम नहीं होता। पराया देश होने के कारण यहां दिवाली पर छुट्टी नहीं मिलती लेकिन फिर भी सभी अपना काम निपटा कर गुरुद्वारे जाते हैं और वहां अरदास की जाती है।
चंडीगढ़ की मूल निवासी कौर ने कहा कि हम गुरुद्वारे और घर में मोमबत्तियां और दीए जलाते हैं। काफी आतिशबाजी की जाती है। सब एक दूसरे से मिलने भी जाते हैं। खास बात यह होती है कि इस दिन सभी भारतीय परिधान पहनते हैं।
कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी से एम एस करने एक साल पहले अमेरिका गए कुंदन पाटीदार ने कहा कि अमेरिका में न्यूयॉर्क और कैलिफोर्निया ऐसे दो बड़े शहर हैं जहां भारतीयों की तादाद काफी ज्यादा है। यहां ‘एसोसिएशन ऑफ इंडियंस इन अमेरिका’ भी सक्रिय है जिसके जरिए अधिकतर भारतीय एक दूसरे से संपर्क में रहते हैं।
उन्होंने कहा कि दीपावली पर अपने देश में नहीं होने पर सबसे ज्यादा यह बात सालती है कि आप हर घर को रोशनी से नहाए और आसमान में आतिशबाजी को नहीं निहार सकते।
कुंदन कहते हैं कि यहां ‘साउथ स्ट्रीट सीपोर्ट’ में 17 अक्टूबर को उत्सव मनाया जाएगा। इस दौरान आतिशबाजी और अन्य कार्यक्रम होंगे। लंदन में एचसीएल में साफ्टवेयर पेशेवर ज्ञानेंद्र चतुर्वेदी भी मानते हैं कि ब्रिटेन में भले ही दीपावली का जश्न अच्छी तरह मनाया जाता हो लेकिन अपने वतन में होने की बात कुछ और ही होती है।
उन्होंने बताया कि लंदन में भारतीयों की आबादी चार लाख के आसपास है। इसके चलते दीपावली पर होने वाले उत्सव में यह अहसास नहीं होता कि आप अपनों के बीच नहीं हैं। फिर भी अपने देश की याद आती जरूर है।

चतुर्वेदी ने कहा कि यहां साउथ हॉल में हर साल दीयों और आतिशबाजी के साथ दीपावली मनाई जाती है। इस बार भी यहां अधिकतर प्रवासी इकट्ठे होंगे और त्योहार मनाएंगे।

 
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Posted by on अक्टूबर 18, 2009 in दीपावली

 

दीवाली के साथी

जरा कल्पना कीजिये, मोमबत्ती, मिठाई व आतिशबाजी नहीं होते, तो हम दीवाली कैसे मनाते? इन तीन के बिना कितनी फीकी होती हमारी दीवाली । क्या दीवाली भी सामान्य त्योहारों की तरह ही बनकर नहीं रह जाती?
क्यों आप सोच में पड़ गए न!? चलो पता करते हैं इन तीन के बारे में कि वे सबसे पहले कब और कैसे आई? हमने कब जाना कि मिठाई जैसी कोई चीज है और आतिशबाजी या मोमबत्ती का प्रचलन किस तरह से शुरू हुआ? है न ये कुछ रोचक सवाल? ऐसे सवाल, जो शायद कभी आपके जेहन में न आए हों, पर अब इन्हें जानकर दीवाली के सेलिब्रेशन का मजा कुछ और बढ़ जाएगा।
[चीनी नहीं इंडियन साल्ट]
दीवाली पर मिठाइयों के साथ-साथ आपको चॉकलेट्स, टॉफियां भी उपहार में मिलती होंगी। पर चीनी के बिना ये चीजें होतीं क्या? शहद में यदि ये तैयार भी होती, तो शायद इसमें चीनी जैसा आनंद न होता।
चीनी पहली बार कब बनी? इसे जानने के पचड़े में हमें नहीं पड़ना, पर यह जरूर जान लें कि चीनी से पहले दुनिया ने शहद का प्रयोग किया। और जब चीनी का प्रयोग शुरू हुआ, तब यह महज दवाई के तौर पर इस्तेमाल होती थी। ग्रीक सभ्यता में चीनी सैकरोन कहलाती थी। भारत में चीनी मिलने के प्रमाण अन्य स्त्रोतों के अलावा, ग्रीक फिजिशियन डायोसोरिडस से भी मिला है। उन्होंने मध्यकाल में पंजाब क्षेत्र में मिलने वाली मीठे और सफेद नमक जैसी चीज को इंडियन साल्ट कहा था।
[आतिशबाजी का आविष्कार]
सही मायने में आतिशबाजी की परंपरा तब शुरू हुई, जब चीनियों ने बारूद का आविष्कार किया। वे इटली के व्यापारी मार्कोपोलो थे, जिन्हें चीन से यूरोप बारूद लाने का श्रेय दिया जाता है। धीरे-धीरे जब बारूद दुनिया भर में पॉपुलर हुआ, तो आतिशबाजी भी प्रत्येक उत्सव और त्योहारों का अंग बनने लगी। चीनी बौद्ध भिक्षु ली तियान को पटाखे का आविष्कारक मानते हैं। इस आविष्कारक को श्रद्धांजलि देने लिए ही वे हर वर्ष 18 अप्रैल के दिन को सेलिब्रेट करते हैं। यह जानना बड़ा रोचक है कि सदियों पहले लोग इन आवाजों के लिए हरे बांस का प्रयोग करते थे। चीन में किसी उत्सव या खास दिन को सेलिब्रेट करने के लिए लोग ढेर सारे हरे बांस के गट्ठर को आग में झोंककर दूर हट जाते और इसके थोड़ी देर बाद ही जोरदार धमाके का लुत्फ उठाते थे। बहरहाल, अभी जो आप लोग आतिशबाजी से रंग-बिरंगी रोशनी का आनंद लेते हो, पहले यह नहीं था। केवल नारंगी रंग की रोशनी ही हरे बांस के गट्ठर के जलने के दौरान नजर आती थी। वे इटली के रसायन विज्ञानी थे, जिन्होंने आतिशबाजी को रंगीन बनाया। दरअसल, इन्होंने ही लाल, हरे, नीले और पीले रंग पैदा करने वाले रसायन की खोज की। ये रसायन थे क्रमश: स्ट्रांशियम , बेरियम , कॉपर (नीला) और सोडियम (पीला)।
जब पोटाशियम क्लोरेट, बेरियम और स्ट्रांशियम नाइट्रेट जैसे रसायन के आविष्कार हुए, तब भारत में भी कई आतिशबाजी कंपनियां आई और पटाखों का उत्पादन तेजी से शुरू हुआ। इनमें स्टैंडर्ड फायरव‌र्क्स लिमिटेड, शिवकाशी एक ब्रांड नेम है। आज कोरिया, इंडोनेशिया, जापान के पटाखे भी आपको बाजार में मिल जाएंगे। बटरफ्लाई, स्पिनव्हील्स, फ्लॉवर पॉट्स इन खास आतिशबाजियों के नाम हैं। इनमें से कई ऐसे हैं, जिनको जलाने के लिए चिंगारी की नहीं, रिमोट की जरूरत पड़ती है।
[चर्बी से मोम तक]
प्राचीन सभ्यताओं में जानवरों के खाल की वसा और कीट पतंगों से मिले मोम को पेपर ट्यूब्स में डालकर मोमबत्ती बनाने के प्रमाण हैं। अमेरिकी कैंडल फिश नामक तैलीय मछली का उपयोग मोमबत्ती जैसी चीज बनाने के लिए करते थे। जब पैराफिन का आविष्कार हुआ, तब से चर्बी के प्रयोग की परंपरा बिल्कुल बंद हो गई।
कहते हैं मधुमक्खी के छत्ते से मोम बनाने की शुरुआत तेरहवीं सदी में हुई। इस पेशे में रहने वाले लोग घूम-घूमकर अपने कस्टमर की डिमांड के अनुसार चर्बी वाली या मधुमक्खी के छत्ते से मिले मोम से बनी मोमबत्ती बेचते थे। फिर स्टीरिक एसिड (मोम को कड़ा करने वाला केमिकल) और गुंथी हुई बातियों का इस्तेमाल होने के बाद मोमबत्ती ने नया स्वरूप ग्रहण किया। आज कई तरह की डिजाइनर मोमबत्तियां आ गई हैं। ऑयल कैंडल, फ्रेगरेंस वाली कैंडल और न जाने कितने प्रकार के कैंडल्स आप मार्केट में देख सकते हैं ।
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क्यों कि अब सब साधन मौजूद है चलिए दीवाली मानते है !

आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !

 
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Posted by on अक्टूबर 16, 2009 in दीपावली

 

और भी देशों में होता है रोशनी का जलसा

रोशनी का महत्व सिर्फ भारत के सबसे बड़े त्योहार दीपावली भर में नहीं है, बल्कि दुनिया के कुछ और देशों में भी है जहां क्रिसमस से पहले आस्था या मान्यताओं के कारण लोग अपने घरों में प्रकाश को अहमियत देते हैं।
वैसे, ऐसे ज्यादातर देशों में रोशनी के त्योहार क्रिसमस से जुड़े हैं जिनके तहत ईसा मसीह के जन्मदिन से पहले कुछ हफ्तों या दिनों तक नियमित तौर पर दीप या मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। लेकिन कुछ देश ऐसे भी हैं जहां रोशनी के जलसे के पीछे की कहानी हजारों साल पुरानी और दिलचस्प है।
अगर शुरुआत ‘हनुक्का’ से करें तो यहूदी धर्म मानने वालों में रोशनी का यह पर्व मनाने का सिलसिला काफी पुराना है। इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है। ईसा के जन्म से पूर्व 165वीं शताब्दी में मैकाबी और सीरिया के लोगों के बीच अब के इजरायल के आसपास संघर्ष हुआ था। संघर्ष क्षेत्र में रोशनी के लिए महज एक दिन का तेल बचा लेकिन लोगों ने पाया कि उनके साथ एक चमत्कार हुआ और एक दिन का तेल आठ दिन तक चला। इसके बाद से यहां भी यहूदी कैलेंडर के मुताबिक दिसंबर के आसपास नौ मोमबत्तियां जलाने की परंपरा शुरू हो गई।
हॉलैंड में भी रोशनी के उत्सव के पीछे कहानी कुछ ऐसी ही है। कहा जाता है कि यहां एक बार मर्टिन नाम का एक व्यक्ति बर्फीले तूफान के बीच अपने घर लौट रहा था। उसने एक लबादा पहन रखा था। अचानक उसने अंधेरे में एक व्यक्ति को बैठे देखा। उसने व्यक्ति पर दया दिखाई और उसे अपना लबादा दे दिया।
मार्टिन एक संत थे और उनके दयाभाव के सम्मान में हॉलैंड में हर वर्ष 11 नवंबर को रोशनी का पर्व मनाया जाने लगा। इस दिन बच्चे लालटेन लेकर घर-घर जाते हैं और गीत गाते हैं। थाइलैंड में नवंबर में पूर्णिमा के दिन दीप पर्व मनाया जाता है। इस दिन ‘क्रेथोन्ग’ यानी केले के पत्तों से बने कमल के आकार के पात्र में एक दीया, कुछ फूल और सिक्के लेकर लोग नदी किनारे जाते हैं। दीया जलाने के बाद प्रार्थना की जाती है। माना जाता है कि पूर्णिमा के दिन ‘क्रेथोन्ग’ को नदी किनारे ले जाने से दुर्भाग्य दूर हो जाता है।
स्वीडन में क्रिसमस से पहले तक मौसम बहुत ठंडा हो चुका होता है। दिसंबर के महीने में यहां दिन में बमुश्किल कुछ घंटे ही धूप खिलती है। क्रिसमस से पहले 13 दिसंबर को स्वीडन के लोग ‘सेंट लूसिया डे’ मनाते हैं जो एक तरह का दीप उत्सव ही होता है। इस दिन लोग अपने घरों में खास तौर पर प्रकाश व्यवस्था करते हैं। फ्रांस में दीपावली की किस्म का ही एक त्योहार मनाया जाता है। दिसंबर में क्रिसमस से पहले चार दिन लगातार रविवार मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। कुछ परिवार लकड़ियां भी जलाते हैं जिसका मकसद ईसा मसीह के जन्म से पहले के चार रविवार रोशन करना होता है।
म्रिस की बात करें तो यहां अधिकतर ईसाई ‘कॉप्टिक आर्थोडॉक्स’ गिरिजाघर को मानते हैं। यहां छह और सात जनवरी को क्रिसमस मनाया जाता है। इस दौरान गिरिजाघरों और घरों को रोशनी से सजाने के अलावा गरीबों को भी मोमबत्तियां देने की परंपरा है। मिस्र में यह उत्सव चार सप्ताह से लेकर 45 दिन तक चलता है। दिलचस्प बात यह है कि मासांहार के शौकीन मिस्र के लोग इस उत्सव के दौरान उपवास रखते हैं और शाकाहार ही लेते हैं।
फिलिपीन में एशिया में सबसे ज्यादा ईसाई रहते हैं। यहां क्रिसमस से नौ दिन पहले एक विशेष ‘मास’ [प्रार्थना] होता है जिसमें ईसा मसीह के जन्म की बात सुनाई जाती है। इस दौरान पूरे नौ दिन सितारे के आकार वाले दीए लगाए जाते हैं। नौ दिन के उत्सव के दौरान एक दीप यात्रा भी निकाली जाती है जिसमें लोग सितारे के आकार वाला दीया अपने साथ लेकर चलते हैं।
मैक्सिको में भी क्रिसमस से नौ दिन पहले लोग एक दूसरे के घर जली हुई मोमबत्तियां लेकर जाते हैं। चीन में ईसाई अल्पसंख्यक हैं और उनमें क्रिसमस में ‘क्रिसमस ट्री’ में पूरी तरह रोशनी करने की परंपरा है। लेकिन मूल चीन के लोग जनवरी के अंत में चीनी नववर्ष मनाते हैं और इस दौरान खासकर घरों के अंदर रोशनी करने का महत्व रहता है।

ब्राजील में रोशनी का उत्सव नववर्ष से जुड़ा है जब इस देश के लोग 31 दिसंबर की रात जल की अफ्रीकी देवी ‘इएमांजा’ की पूजा करते हैं। वे मानते हैं कि इस दिन सैंकड़ों मोमबत्तियां जलाने से देवी उन्हें दुआ देगी। कवांजा में हर वर्ष 26 दिसंबर को अफ्रीकी फसलों का त्योहार मनाया जाता है। इस दौरान हर परिवार एक सप्ताह तक सात मोमबत्तियां या दीए जलाता है।

 
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Posted by on अक्टूबर 16, 2009 in दीपावली

 

जलाएं प्रेम का दीया

दीपक की बाती जलने के लिए उसका तेल में डूबा रहना जरूरी है। साथ ही, उसका तेल से बाहर रहना भी उतना ही जरूरी है। यदि बाती तेल में पूरी तरह डूब जाती है, तो वह प्रकाश नहीं दे पाती। हमारा जीवन भी दीपक की बाती के समान है। हमें संसार में रहते हुए भी उससे अधिक प्रभावित नहीं होना चाहिए। यदि आप पदार्थ जगत में डूब जाएंगे, तो जीवन में आनंद और ज्ञान दोनों नहीं मिल पाएगा। इसलिए सांसारिक माया-मोह में डूबने से बचें। ज्ञान और प्रकाश के प्रकट होने का उत्सव ही दीवाली है। इस दिन घरों में की जाने वाली रोशनी न केवल सजावट के लिए होती है, बल्कि वह जीवन के गहरे सत्य को भी व्यक्त करती है। वह संकेत देती है कि हम हरेक दिल में प्रेम और ज्ञान की लौ प्रज्ज्वलित करें और सभी के चेहरों पर सच्ची मुस्कान लाएं।
प्रत्येक मनुष्य में कुछ सद्गुण होते हैं। प्रज्ज्वलित दीपक इसी का प्रतीक है। केवल एक ही दीप जला कर संतुष्ट न हों, हजारों दीप प्रज्ज्वलित करें, क्योंकि अज्ञानता के अंधकार को दूर करने के लिए हमें अनेक ज्योतिपुंज जलाने होंगे। ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित होने से आत्मा के सभी पहलू जाग्रत हो जाते हैं। जीवन का एक और गूढ़ रहस्य दीवाली के पटाखों के फूटने में है।
जीवन में कई बार आप पटाखों के समान अपनी दबी हुई भावनाओं, कुंठाओं और क्रोध के कारण अति ज्वलनशील रहते हैं, बस फूटने के लिए तैयार। आप अपने राग-द्वेष, घृणा आदि को दबाकर फटने की उस स्थिति तक पहुंच जाते हैं कि अब फूटे कि तब। पटाखे फोड़ने की प्रथा दबी हुई भावनाओं से मुक्ति पाने का एक सुंदर मनोवैज्ञानिक उपाय है। जब आप बाहर विस्फोट देखते हैं, तो आपके अंदर भी वैसी ही कुछ अनुभूति होती है। विस्फोट के साथ प्रकाशपुंज भी होता है। आप अपनी दबी हुई भावनाओं से मुक्त होते हैं, फिर भीतर शाति का उदय होता है।

अपने नित नूतन और चिर पुरातन स्वभाव का अनुभव करने के लिए इन दबी हुई भावनाओं से मुक्त होना अति आवश्यक है। दीपावली का अर्थ है वर्तमान क्षण में जीना। अतीत का पछतावा और भविष्य की चिंता छोड़ कर वर्तमान क्षण में जिएं।

 

तराशते हैं लक्ष्मी फिर भी मुफलिस

आगरा के प्रजापति समाज की कई बस्तियां, जहां इन दिनों दीपावली पर उजियारा और समृद्धि फैलाने के लिए दिन-रात सैकड़ों हाथ जुटे हुए हैं। ये हाथ कहीं मिंट्टी के दीपक बना रहे हैं, तो कहीं लक्ष्मी-गणेश प्रतिमाएं। लक्ष्मी की प्रतिमा को आकार देने वाले ये शिल्पकार आज भी मुफलिसी में जी रहे हैं। लोहामंडी में दो सौ, नामनेर और छिलीईंट घटिया में सौ-सौ परिवार इस शिल्प से पीढि़यों से जुड़े हैं। दीपावली के महापर्व की तैयारियों में यहां लक्ष्मी, गणेश के साथ सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनायी जा चुकी हैं, अब उन्हें दिया जा रहा है अंतिम रूप। सिरकी मंडी में प्रतिमा बना रहे प्रेमचंद बताते हैं कि यहां दीपावली से कई महीने पहले लक्ष्मी व गणेश और गणेशोत्सव से पूर्व गणपति की प्रतिमाएं बननी शुरू हो जाती हैं।
शिल्पकार ब्रह्मानंद का कहना था कि यहां दीपावली पर कई करोड़ का व्यापार होता है। यहां से मूर्तियां दिल्ली, जयपुर, मुंबई सहित तमाम महानगरों में जाती हैं। कोलकाता और लखनऊ की मूर्तियों में सुंदरता अधिक होती है, जबकि आगरा में तादाद।
वे बताते हैं कि पहले मूर्तियां सादी ही पसंद की जाती थीं, अब कपड़े की पोशाक, मोतियों की माला, मुकुट यहां तक कि गणेशजी को धागे का जनेऊ भी पहनाया जाता है। मूर्तियां तो जमाने के मुताबिक बदल गई हैं लेकिन उनकी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। तकनीक भी पुरानी ही चल रही है। मूर्ति बना रहे ताराचंद का कहना था कि उनकी कई पीढि़यां इस काम को कर रही हैं। शासन-प्रशासन उनकी परवाह नहीं करता। उन्हें सुविधायें मिलें तो तरक्की हो सकती है। शिल्पियों का कहना है कि उनकी मेहनत का लाभ विक्रेताओं को मिलता है। उन्हें तो मजदूरी भी नहीं मिल पाती।

पिछले दो साल से यहां साईं बाबा की प्रतिमा की मांग बढ़ी है। इनकी मूर्तियां भी बड़ी संख्या में बन रही हैं। तीन पीढि़यों से मिट्टी के दीपक बना रहे 45 वर्षीय पूरन बताते हैं कि उनके किसी बच्चे ने चाक चलाना नहीं सीखा। पूरे दिन चाक पर काम करने के बाद भी 50 रुपए नहीं मिलते। अत: अब उनके परिवार में कोई चाक नहीं चलायेगा। वे प्लास्टर आफ पेरिस की ही मूर्तियां बनाएंगे।