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Category Archives: चुनाव

राजनीतिक अवसरवादिता – अब बस भी करो !!

उत्तर प्रदेश के दो बड़े नेता मुलायम सिंह और कल्याण सिंह जिस तरह यकायक एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए उससे उनकी राजनीतिक अवसरवादिता का ही पता चलता है। अब इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि मुलायम सिंह ने जब यह समझा कि कल्याण सिंह उनके वोट बढ़ाने का काम कर सकते हैं तब उन्होंने उन्हें गले लगा लिया और जब यह समझ आया कि उनका साथ महंगा पड़ा तो दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंका। कल्याण सिंह से तौबा करने के संदर्भ में मुलायम सिंह की इस सफाई का कोई मूल्य नहीं कि वह तो उनकी पार्टी में थे ही नहीं और उन्हें आगरा अधिवेशन का निमंत्रण पत्र गलती से चला गया था। एक तो कल्याण सिंह के स्पष्टीकरण से यह साफ हो गया कि मुलायम सिंह की यह सफाई सही नहीं और दूसरे यह किसी से छिपा नहीं कि आगरा अधिवेशन में सपा ने उन्हें किस तरह हाथोंहाथ लिया था। कल्याण सिंह ने भले ही सपा की विधिवत सदस्यता ग्रहण न की हो, लेकिन वह पार्टी के एक नेता की तरह ही मुलायम सिंह के पक्ष में खड़े रहे और उनकी ही तरह भाजपा को नष्ट करने का संकल्प लेते रहे। यह बात और है कि सपा को उनका साथ रास नहीं आया और पिछड़े वर्गो का एकजुट होना तो दूर रहा, मुलायम सिंह के परंपरागत वोट बैंक में भी सेंध लग गई। यह आश्चर्यजनक है कि सपा नेताओं ने यह समझने से इनकार किया कि कल्याण सिंह से नजदीकी मुस्लिम वोट बैंक की नाराजगी का कारण बन सकती है।

इसमें संदेह है कि सपा के कल्याण सिंह से हाथ जोड़ने के बाद मुस्लिम वोट बैंक फिर से उसकी ओर लौट आएगा। इसमें भी संदेह है कि एक तरह से सपा से निकाल बाहर किए गए कल्याण सिंह का भाजपा में स्वागत किया जाएगा। जिस तरह मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को गले लगाकर अपनी विश्वसनीयता को क्षति पहुंचाई उसी तरह कल्याण सिंह भी अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। फिलहाल यह कहना कठिन है कि उनकी भाजपा में पुन: वापसी हो पाएगी या नहीं, लेकिन यह लगभग तय है कि उनकी वापसी का भाजपा को कोई लाभ नहीं मिलने वाला। कल्याण सिंह भले ही प्रायश्चित के रूप में भाजपा को मजबूत करने की बात कह रहे हों, लेकिन आम जनता यह कैसे भूल सकती है कि वह कल तक भाजपा को मिटा देने का संकल्प व्यक्त कर रहे थे? सवाल यह भी है कि आखिर उन्हें प्रायश्चित के कितने मौके किए जाएंगे? राजनीतिक स्वार्थो के लिए किसी भी हद तक जाने की एक सीमा होती है। यह निराशाजनक है कि कद्दावर नेता होते हुए भी मुलायम सिंह और कल्याण सिंह, दोनों ने इस सीमा का उल्लंघन करने में संकोच नहीं किया। वोट बैंक के रूप में ही सही आम जनता इतना तो समझती ही है कि राजनेता किस तरह उसके साथ छल करते हैं। वोट बैंक निश्चित ही बैंक खातों में जमा धनराशि नहीं कि उसे मनचाहे तरीके से दूसरे के खाते में स्थानांतरित किया जा सके। मुलायम सिंह और कल्याण सिंह का हश्र यह बता रहा है कि वोटों के लिए कुछ भी कर गुजरने और यहां तक कि आम जनता की भावनाओं से खेलने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं।

 

तेरह दल कर रहे हैं पांच चुनाव चिह्नों का साझा प्रयोग

वे अपनी विचारधाराओं में अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन निर्वाचन आयोग का शुक्रिया है कि विभिन्न राज्यों में 13 दल पांच चुनाव चिह्नों का साझा इस्तेमाल कर रहे हैं। निर्वाचन आयोग की वेबसाइट के अनुसार हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा रखने वाली बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना का चुनाव चिह्न ‘धनुष बाण’ है, तो वहीं शिबू सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा का चुनाव चिह्न भी ‘धनुष बाण’ है।
मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिह्न हाथी है, तो वहीं असम में मुख्य विपक्षी दल असम गण परिषद का चुनाव चिह्न भी हाथी ही है। पूर्वोत्तर के दो राज्यों असम तथा सिक्किम को छोड़कर देश के अन्य सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बसपा का चुनाव चिह्न आरक्षित है।
निर्वाचन आयोग ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में चुनाव चिह्न के रूप में ‘साइकिल’ मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी को दे रखी है, लेकिन दूसरी ओर आंध्र प्रदेश में तेलगू देशम, जम्मू कश्मीर में नेशनल पैंथर्स पार्टी, केरल में केरल कांग्रेस और मणिपुर में मणिपुर पीपुल्स पार्टी का चुनाव चिह्न भी ‘साइकिल’ ही है।

केरल में ‘दो पत्तियां’ केरल कांग्रेस [एम] का चुनाव चिह्न है, तो वहीं तमिलनाडु और पुडुचेरी में यह जयललिता की अन्नाद्रमुक का भी चुनावी निशान है। पश्चिम बंगाल में ‘शेर’ का इस्तेमाल फॉरवर्ड ब्लॉक करती है, तो गोवा में जंगल का यह राजा महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी का भी चुनाव चिह्न है। 58 पंजीकृत चुनाव चिह्न ऐसे हैं जो अभी आवंटित किए जाने हैं, जबकि एक हजार से अधिक पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त दल चुनावी निशान मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।