RSS

Category Archives: कश्मीर

आतंकियों के आका – परवेज मुशर्रफ

परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष ही नहीं रहे हैं, बल्कि वह आतंकियों के आका भी रहे हैं। यहां तक कि एक भारतीय सेना के अधिकारी का गला रेतने वाले आतंकी को उन्होंने एक लाख रुपये के इनाम से नवाजा था। यह साल 2000 की बात है। लेकिन अगले ही साल अमेरिका में हुए आतंकी हमले के बाद उन्हें अमेरिकी दबाव के चलते अपने इस पसंदीदा आतंकी के संगठन पर पाबंदी लगानी पड़ी थी। मुशर्रफ का यह ‘आतंकी’ चेहरा पाकिस्तान के ही मीडिया ने उजागर किया है।
‘द न्यूज’ अखबार ने रविवार को बताया है कि मुशर्रफ आतंकी कमांडर इलियास कश्मीरी के काम से इतने खुश हुए कि उन्हें इनाम में एक लाख रुपये बख्श दिए। इलियास 1990 के दशक में जम्मू-कश्मीर में बेहद सक्रिय था। रिपोर्ट के मुताबिक 26 फरवरी, 2000 को कश्मीरी अपने 25 साथियों के साथ नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय सीमा में घुसा। वह एक दिन पहले भारतीय सेना की कार्रवाई में 14 आतंकियों की मौत का बदला लेने के लिए गया था। उसने नाकयाल सेक्टर में भारतीय सेना पर घात लगा कर हमला बोल दिया। आतंकियों ने भारतीय सेना के एक बंकर को घेर लिया और ग्रेनेड से हमला किया। इस हमले में घायल एक सैन्य अधिकारी को कश्मीरी ने अगवा कर लिया और बाद में उसने अधिकारी का सिर कलम कर दिया। यही नहीं, उसने अधिकारी का कटा हुआ सिर पाकिस्तान सेना के शीर्ष अधिकारियों को पेश किया। इस पर खुश होकर तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने पाक सेना के कमांडो रहे कश्मीरी को एक लाख रुपये का इनाम दिया।
अखबार लिखता है कि कश्मीरी से मुशर्रफ को बेहद लगाव था। उन्होंने उसे आतंकी खेल खेलने की खुली छूट दे रखी थी। लेकिन 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका में हुए आतंकी हमले के बाद दबाव के चलते मुशर्रफ को कश्मीरी के संगठन पर प्रतिबंध लगाना पड़ा।
कौन था इलियास कश्मीरी ??
कश्मीरी हरकल-उल-जिहाद अल-इस्लामी [हूजी] का कमांडर था। उसके संबंध अल कायदा और तालिबान सहित तमाम आतंकी संगठनों से थे। बताया जाता है कि वह पिछले सप्ताह ड्रोन हमले में मारा गया।
कश्मीरी पाकिस्तानी सेना के स्पेशल सर्विस गु्रप में बतौर कमांडो काम कर चुका था। अफगानिस्तान से रूसी सेना हटने के बाद पाक हुक्मरान ने उसे कश्मीरी आतंकियों के साथ काम करने के लिए भेजा था। तब 1991 में वह हूजी में शामिल हुआ। कुछ दिनों बाद हूजी प्रमुख कारी सैफुल्ला अख्तर से उसके मतभेद हो गए और उसने ‘313 ब्रिगेड’ नाम से अपना संगठन बना लिया।
गुलाम कश्मीर के कोटली का रहने वाला कश्मीरी बारूदी सुरंग बिछाने में माहिर था। अफगानिस्तान में लड़ाई के दौरान उसकी एक आंख खत्म हो गई थी। उसे भारतीय सेना ने एक बार पूंछ इलाके में गिरफ्तार भी किया था। दो साल बाद वह जेल तोड़ कर भाग निकला था। वर्ष 1998 में कश्मीरी को भारतीय सेना पर हमले करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
जैश-ए-मुहम्मद के गठन के बाद पाकिस्तानी सेना से कश्मीरी के रिश्ते खराब हो गए। सेना उसे जैश का सदस्य बनाना चाहती थी। सेना की इच्छा थी कि कश्मीरी जैश सरगना मसूद अजहर को नेता मान ले। पर उसे यह गवारा नहीं हुआ।
————————————————————————————————————————————-
अब सवाल यह उठता है कि इस खुलासे के बाद भी क्या भारत में आयोजित विभिन्न सेमिनार्रो में मुशर्रफ को बतौर महेमान बुलाने का सिलसिला जारी रहेगा ??
देखे  :-

बेशरम मुशर्रफ !!!!

Advertisements
 

कश्मीर में पाकिस्तान की नापाक दखल

कश्मीर में पाकिस्तान की नापाक दखल

भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन के 27 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर के विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करते ही भारत ने अपनी सेना को हवाई-मार्ग से श्रीनगर के लिए रवाना कर दिया था। श्रीनगर से उरी तक, यानी कृष्णगंगा नदी के पूर्वी भाग को पाकिस्तान के नियंत्रण से मुक्त करा दिया गया। एक नवंबर को राष्ट्रसंघ द्वारा युद्धविराम की घोषणा होते ही भारतीय सेना कृष्णगंगा नदी के इस पार ही रुक गई, जबकि दूसरी ओर पाकिस्तान ने युद्धविराम के 15 दिन बाद तक यानी 16 नवंबर तक कार्रवाई जारी रखी और पूरे गिलगित को अपने नियंत्रण में कर लिया। जिला मुजफ्फराबाद से 30 किलोमीटर तक यानी कृष्णगंगा का पश्चिमी भाग पाकिस्तान ने हथिया लिया और इसे आजाद कश्मीर का नाम दे दिया।
साक्ष्यों से स्पष्ट हो जाता है कि 1947 के युद्ध के लिए पाकिस्तान ही पूरी तरह उत्तरदायी है। यह बात भी साफ है कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के सेनाध्यक्ष ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह और उनके साथियों की हत्या के लिए भी जिम्मेदार है। यह तथ्य भी सामने आ चुका है कि महाराजा हरि सिंह के साथ ‘नो वार’ समझौते के बाद भी पाकिस्तान ने 20 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर पर मुजफ्फराबाद के रास्ते हमला किया और जम्मू-कश्मीर की लगभग पांच हजार वर्गमील भूमि पर कब्जा जमा लिया। लार्ड माउंटबेटन की सलाह पर भारत ने पाकिस्तान के इस हमले के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में एक अर्जी दाखिल की, जिसकी सुनवाई आज तक पूरी नहीं हो सकी है। 1 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र ने युद्धविराम का आदेश दिया और उस आदेश के बाद भी अस्तौर में जम्मू-कश्मीर महाराजा द्वारा नियुक्त किए गए राज्यपाल ब्रिगेडियर घनसारा सिंह को मुस्लिम स्काउटों ने बंदी बना लिया और 16 नवंबर को उन्हें पाकिस्तान की सेना के हवाले कर दिया। इसी दिन पाकिस्तानी सैनिकों ने पूरे गिलगित-बल्तिस्तान में से गैरमुस्लिम लोगों को मार भगाया और जम्मू-कश्मीर के इस हिस्से को अपनी एक बस्ती के रूप में हथिया लिया। इसकी आबादी 5-6 लाख रही होगी और क्षेत्रफल 32,500 वर्ग मील। इसी क्षेत्र में चितराल, गिलगित और कराकोरम क्षेत्र शामिल हैं। 1963 में कराकोरम के 4,500 वर्गमील क्षेत्र को पाकिस्तान ने चीन के हवाले कर दिया।
16 नवंबर को जम्मू-कश्मीर के गिलगित का लगभग एक-तिहाई क्षेत्र पाकिस्तान ने हथिया लिया और 25 नवंबर, 1947 को पाकिस्तानी सेना की सहायता से कुछ लोगों ने हजारों गैर-मुस्लिमों को मीरपुर के मैदान में इकट्ठा कर उन पर गोलीबारी शुरू कर दी। तथाकथित आजाद कश्मीर भारत के नेताओं की गलतियों के कारण अस्तित्व में आया। गिलगित-बल्तिस्तान के जिलों को पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर का वैधानिक अंग करार दिया है, जिसका क्षेत्र 32,500 वर्ग मील है। उसके एक जिले चितराल को पाकिस्तान ने स्वात घाटी का जिला घोषित कर दिया है। इतना ही नहीं, पाक अधिकृत कश्मीर के 28,000 वर्ग मील भूमि पर रहने वाले 15 लाख लोगों के लिए न्यायालय की कोई सुविधा नहीं है। इन लोगों को कोई मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है। न वहा संविधान लागू है, न कोई अस्पताल है, न कालेज है। इस क्षेत्र की कोई विधानसभा भी नहीं है। केवल पंचायत जैसी काउंसिल शोषण गृह है, जिसका प्रशासन पाकिस्तानी सेना का एक कर्नल चलाता है और बाकी प्रशासनिक अधिकार एक तहसीलदार को दिए गए हैं।
लाखों पाकिस्तानियों ने, जिनमें अधिकतर रिटायर्ड पाकिस्तानी सैनिक ही हैं, इन गरीब बेसहारा लोगों को न्याय से वंचित करके इनकी जमीनों पर कब्जा कर रखा है। यदि हालात नहीं बदलते तो 10 वषरें में गिलगित-बाल्तिस्तान की पूरी जनसांख्यिकी ही बदल जाएगी। हाल ही में बलावरिस्तान मुक्ति मोर्चा के एक नेता अब्दुल हामिद खान किसी तरह दिल्ली पहुंचे और भारत के नेताओं के सामने उन्होंने पाकिस्तान के उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने में मदद करने की अपील की, परंतु ऐसा लगता है कि या तो भारत के राजनेता जम्मू-कश्मीर के इतिहास से बेखबर हैं या वे गिलगित में हो रहे नरसंहार की परिस्थितियों को स्वीकार नहीं करना चाहते।
आश्चर्य इस बात का है कि पाकिस्तान की ओर से अंतरराष्ट्रीय नियमों के इतने घोर आपराधिक उल्लंघन, मानवाधिकारों की अवहेलनाओं, राष्ट्रसंघ द्वारा पारित युद्ध-विराम के आदेश तथा पारित किए गये प्रस्तावों के खुल्लमखुल्ला उल्लंघन के बावजूद पूरा राष्ट्र इससे बेखबर रहा और पिछले छह दशकों से भारत व जम्मू-कश्मीर के लोगों, जिनमें बुद्धिजीवी, विचारक और राजनेता सभी शामिल है, ने पाकिस्तान के इन आपराधिक कृत्यों का मामला विश्व-समुदाय के सामने नहीं उठाया।

– प्रो. भीम सिंह  [लेखक पैंथर्स पार्टी के प्रमुख हैं]