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एक रि पोस्ट :- शिक्षक दिवस पर विशेष – तीन ताकतों को समझने का सबक

04 सितम्बर

यह संयोग भारत में ही संभव हो सकता था कि एक शिक्षक राष्ट्रपति बन जाए और एक राष्ट्रपति शिक्षक। 
बात हो रही है क्रमश: डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (जिनका जन्मदिन आज शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है) और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की, जो राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद कई शिक्षण संस्थानों में अतिथि शिक्षक के रूप में सेवा दे रहे है। चलिए , जानते है डॉ. कलाम के स्कूली दिनों और उन शिक्षकों के बारे में, जिन्होंने उन पर प्रभाव डाला –उन्ही की जुबानी |

मेरा जन्म मद्रास राज्य के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था। मेरे पिता जैनुलाबदीन की कोई बहुत अच्छी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी और ही वे कोई बहुत धनी व्यक्ति थे। इसके बावजूद वे बुद्धिमान थे और उनमें उदारता की सच्ची भावना थी। मेरी मां, आशियम्मा, उनकी आदर्श जीवनसंगिनी थीं। हम लोग अपने पुश्तैनी घर में रहते थे। रामेश्वरम् की मसजिदवाली गली में बना यह घर पक्का और बड़ा था।

[बहुत बुरा लगा था पीछे बैठना]
बचपन में मेरे तीन पक्के दोस्त थे- रामानंद शास्त्री, अरविंदन और शिवप्रकाशन। जब मैं रामेश्वरम् के प्राइमरी स्कूल में पांचवीं कक्षा में था तब एक नए शिक्षक हमारी कक्षा में आए। मैं टोपी पहना करता था, जो मेरे मुसलमान होने का प्रतीक था। कक्षा में मैं हमेशा आगे की पंक्ति में जनेऊ पहने रामानंद के साथ बैठा करता था। नए शिक्षक को एक हिंदू लड़के का मुसलमान लड़के के साथ बैठना अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मुझे पीछे वाली बेंच पर चले जाने को कहा। मुझे बहुत बुरा लगा। रामानंद भी मुझे पीछे की पंक्ति में बैठाए जाते देख काफी उदास नजर आ रहा था। स्कूल की छुट्टी होने पर हम घर गए और सारी घटना अपने घरवालों को बताई। यह सुनकर रामानंद के पिता लक्ष्मण शास्त्री ने उस शिक्षक को बुलाया और कहा कि उसे निर्दोष बच्चों के दिमाग में इस तरह सामाजिक असमानता एवं सांप्रदायिकता का विष नहीं घोलना चाहिए। उस शिक्षक ने अपने किए व्यवहार पर न सिर्फ दु:ख व्यक्त किया, बल्कि लक्ष्मण शास्त्री के कड़े रुख एवं धर्मनिरपेक्षता में उनके विश्वास से उस शिक्षक में अंतत: बदलाव आ गया।

[रसोई के रास्ते टूटी रूढि़यां]
प्राइमरी स्कूल में मेरे विज्ञान शिक्षक शिव सुब्रह्मण्य अय्यर कट्टर ब्राह्मण थे, लेकिन वे कुछ-कुछ रूढि़वाद के खिलाफ हो चले थे। वे मेरे साथ काफी समय बिताते थे और कहा करते, ‘कलाम, मैं तुम्हे ऐसा बनाना चाहता हूं कि तुम बड़े शहरों के लोगों के बीच एक उच्च शिक्षित व्यक्ति के रूप में पहचाने जाओगे।’ एक दिन उन्होंने मुझे अपने घर खाने पर बुलाया। उनकी पत्नी इस बात से बहुत ही परेशान थीं कि उनकी रसोई में एक मुसलमान को भोजन पर आमंत्रित किया गया है। उन्होंने अपनी रसोई के भीतर मुझे खाना खिलाने से साफ इनकार कर दिया। अय्यर जी अपनी पत्नी के इस रुख से जरा भी विचलित नहीं हुए और न ही उन्हे क्रोध आया। उन्होंने खुद अपने हाथ से मुझे खाना परोसा और बाहर आकर मेरे पास ही अपना खाना लेकर बैठ गए। मै खाना खाने के बाद लौटने लगा तो अय्यर जी ने मुझे फिर अगले हफ्ते रात के खाने पर आने को कहा। मेरी हिचकिचाहट को देखते हुए वे बोले, ‘इसमें परेशान होने की जरूरत नहीं है। एक बार जब तुम व्यवस्था बदल डालने का फैसला कर लेते हो तो ऐसी समस्याएं सामने आती ही है।’ अगले हफ्ते जब मैं उनके घर रात्रिभोज पर गया तो उनकी पत्नी ही मुझे रसोई में ले गई और खुद अपने हाथों से मुझे खाना परोसा।

[तीन ताकतों को समझने का सबक]
15 साल की उम्र में मेरा दाखिला रामेश्वरम् के जिला मुख्यालय रामनाथपुरम् स्थित श्वा‌र्ट्ज हाई स्कूल में हुआ। मेरे एक शिक्षक अयादुरै सोलोमन बहुत ही स्नेही, खुले दिमागवाले व्यक्ति थे और छात्रों का उत्साह बढ़ाते रहते थे। रामनाथपुरम् में रहते हुए अयादुरै सोलोमन से मेरे संबंध काफी प्रगाढ़ हो गए थे। वे कहा करते थे, ‘जीवन में सफल होने और नतीजों को हासिल करने के लिए तुम्हे तीन प्रमुख शक्तिशाली ताकतों को समझना चाहिए- इच्छा, आस्था और उम्मीदें।’ उन्होंने ही मुझे सिखाया कि मैं जो कुछ भी चाहता हूं, पहले उसके लिए मुझे तीव्र कामना करनी होगी, फिर निश्चित रूप से मैं उसे पा सकूंगा। वे सभी छात्रों को उनके भीतर छिपी शक्ति एवं योग्यता का आभास कराते थे। वे कहा करते थे- ‘निष्ठा एवं विश्वास से तुम अपनी नियति बदल सकते हो।’

[पिटाई के बाद मिली प्रशंसा]
श्वा‌र्ट्ज हाई स्कूल में कक्षाएं अहाते में अलग-अलग झुंडों के रूप में लगा करती थीं। एक दिन मेरे गणित के शिक्षक रामकृष्ण अय्यर किसी दूसरी कक्षा को पढ़ा रहे थे। अनजाने में ही मैं उस कक्षा से होकर निकल गया। तुरंत ही उन्होंने मुझे गरदन से पकड़ा और भरी कक्षा के सामने बेंत लगाए। कई महीनों बाद जब गणित में मेरे पूरे नंबर आए तब रामकृष्ण अय्यर ने स्कूल की सुबह की प्रार्थना में सबके सामने यह घटना सुनाई और कहा, ‘मैं जिसकी बेंत से पिटाई करता हूं, वह एक महान् व्यक्ति बनता है। मेरे शब्द याद रखिए, यह छात्र विद्यालय और अपने शिक्षकों का गौरव बनने जा रहा है।’ आज मैं सोचता हूं कि उनके द्वारा की गई यह प्रशंसा क्या एक भविष्यवाणी थी?
शिक्षक दिवस पर मैं अपने सभी शिक्षकों
का पुण्य स्मरण करते हुए नमन करता हूँ |
भगवान् उन सब को दीर्घजीवी बनाये  … ताकि वह सब ज्ञान का
प्रकाश दूर दूर तक पंहुचा सकें |
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5 टिप्पणियाँ

Posted by on सितम्बर 4, 2011 in बिना श्रेणी

 

5 responses to “एक रि पोस्ट :- शिक्षक दिवस पर विशेष – तीन ताकतों को समझने का सबक

  1. प्रवीण पाण्डेय

    सितम्बर 4, 2011 at 10:18 अपराह्न

    इच्छा, आस्था और उम्मीद। याद रखनी होगी।

     
  2. Rahul Singh

    सितम्बर 4, 2011 at 10:18 अपराह्न

    रोचक और प्रेरक.

     
  3. देव कुमार झा

    सितम्बर 4, 2011 at 10:30 अपराह्न

    शिक्षक दिवस…..
    बरबस ही याद हो आया की कैसे बचपन में हमारे मास्टर मार पीट कर हम जैसे बदमाशों को लाईन पर ले आए….. भाई वाकई में वह अनुशासन ही बुनियाद थी जिसनें हमें सही राह पर चलना सिखाया…. जय हो…. आज सभी शिक्षकों को कोटि कोटि प्रणाम……
    जय हो….

     
  4. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)

    सितम्बर 4, 2011 at 11:22 अपराह्न

    बहुत ज्ञानवर्धक पोस्ट लगाई है आपने!
    शिक्षक दिवस पर डॉ.राधाकृष्णन जी को नमन करता हूँ!

    आपका ब्लॉग गूगल क्रोम में खुलने में दिक्कत है।
    इंटरनेट एक्सप्लोरर पर ठीक खुल रहा है!

     
  5. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    सितम्बर 4, 2011 at 11:53 अपराह्न

    प्रेरक पोस्ट!! नमन करता हूँ उन सभी शिक्षकों को जिन्होंने इस माटी के माधो को इंसान बनाया!!

     

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