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मैं हर एक पल का शायर हूँ …

24 अक्टूबर

मशहूर गीतकार साहिर लुधियानवी का जन्म मार्च १९२१ को लुधियाना, पंजाब में एक मुस्लिम जमींदार परिवार में हुआ था। साहिर जी का पूरा व्यक्तित्व ही शायराना था। 25 साल की उम्र में उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसका शीर्षक था तल्खियां।

बतौर गीतकार उनकी पहली फिल्म थी बाजी, जिसका गीत तकदीर से बिगड़ी हुई तदबीर बना ले..बेहद लोकप्रिय हुआ। उन्होंने हमराज, वक्त, धूल का फूल, दाग, बहू बेगम, आदमी और इंसान, धुंध, प्यासा सहित अनेक फिल्मों के यादगार गीत लिखे। साहिर जी ने शादी नहीं की पर प्यार के एहसास को उन्होंने अपने नगमों में कुछ इस तरह पेश किया कि लोग झूम उठते। निराशा, दर्द, कुंठा, विसंगतियों और तल्खियों के बीच प्रेम, समर्पण, रूमानियत से भरी शायरी करने वाले साहिर लुधियानवी के लिखे नग्में दिल को छू जाते हैं। लिखे जाने के 50 साल बाद भी उनके गीत उतने ही जवां है जितने पहले थे,

ये वादियां से फिजाएं बुला रही हैं..

ना मुंह छुपा के जिओ और न सिर झुका के..

तुम अगर साथ देने का वादा करो, मैं यूं ही मस्त नग्में..

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं..(गुमराह)

समाज के खोखलेपन को अपनी कड़वी शायरी के मार्फत लाने वाले इस विद्रोही शायर की जरा बानगी तो देखिए,

जिंदगी सिर्फ मोहब्बत ही नहीं कुछ और भी है

भूख और प्यास की मारी इस दुनिया में

इश्क ही एक हकीकत नहीं कुछ और भी है..

इन सब के बीच संघर्ष के लिए प्रेरित करता गीत,

जिंदगी भीख में नहीं मिलती

जिंदगी बढ़ के छीनी जाती है

अपना हक संगदिल जमाने में

छीन पाओ को कोई बात बने..

बेटी की बिदाई पर एक पिता के दर्द और दिल से दिए आशीर्वाद को उन्होंने कुछ इस तरह बयान किया,

बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले..(नीलकमल)

समाज में आपसी भाईचारे और इंसानियत का संदेश उन्होंने अपने गीत में इस तरह पिरोया,

तू न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा ..(धूल का फूल)

साहिर जी को अनेक पुरस्कार मिले, पद्म श्री से उन्हें सम्मानित किया गया, पर उनकी असली पूंजी तो प्रशंसकों का प्यार था। अपने देश भारत से वह बेहद प्यार करते थे। इस भावना को उन्होंने कुछ इस तरह बयां किया….

ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों..

उनका निधन २५ अक्टूबर १९८० को हुआ था पर ऐसे महान शायर की स्मृतियां हमेशा रहेंगी अमर।

आलेख – रमा चंद्र भट्ट

सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से साहिर लुधियानवी जी को शत शत नमन !

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4 टिप्पणियाँ

Posted by on अक्टूबर 24, 2010 in बिना श्रेणी

 

4 responses to “मैं हर एक पल का शायर हूँ …

  1. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)

    अक्टूबर 24, 2010 at 4:25 अपराह्न

    महान शायर साहिर लुधियानवी को मेरा नमन!

     
  2. राज भाटिय़ा

    अक्टूबर 24, 2010 at 4:43 अपराह्न

    बहुत सुंदर लगा साहिर जी के बारे पढ कर धन्यवाद, मेरा भी नमन साहिर जी को

     
  3. संगीता पुरी

    अक्टूबर 24, 2010 at 5:31 अपराह्न

    बहुत अच्‍छी पोस्‍ट .. साहिर लुधियानवी जी को शत शत नमन !

     
  4. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    अक्टूबर 24, 2010 at 11:21 अपराह्न

    शकील बदायूँनी साहब का एक गीत बहुत मशहूर हुआ था..
    इक शहंशाह ने, बनवा के हसीं ताजमहल
    सारी दुनिया को मुहब्बत की निशानी दी है.

    और इसपर साहिर साहब ने एक लंबी नज़्म लिखी थी, कभी वक़्त मिला तो उसपर चर्चा करूँगा..लेकिन उसकी दो लाइनें शकील साहब का जवाब थी.
    इक शहेंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल
    हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक,
    मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे!

    साहिर साहब की शायरी और नग़्मे, रोमैंटिसिज़्म और इंक़लाब की वो बुलंदी है जिसकी ओर देखने की नहीं, उसपर सिर झुकाने की ज़रूरत है!
    शिवम जी! बहुत अच्छा!!

     

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