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एक रिपोस्ट :- ‘लोकमान्य’ की याद में !

31 जुलाई

सही मायने में लोकमान्य थे बाल गंगाधर तिलक (२३/०७/१८५६ – ०१/०८/१९२०)

‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, और हम इसे लेकर रहेंगे’ का नारा देकर देश में स्वराज की अलख जगाने वाले बाल गंगाधर तिलक उदारवादी हिन्दुत्व के पैरोकार होने के बावजूद कट्टरपंथी माने जाने वाले लोगों के भी आदर्श थे। धार्मिक परम्पराओं को एक स्थान विशेष से उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की अनोखी कोशिश करने वाले तिलक सही मायने में ‘लोकमान्य’ थे।

एक स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, शिक्षक और विचारक के रूप में देश को आजादी की दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले तिलक ने कांग्रेस को सभाओं और सम्मेलनों के कमरों से निकाल कर जनता तक पहुंचाया था।
हिन्दुत्ववादी विचारक और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व रणनीतिकार गोविन्दाचार्य ने कहा कि तिलक का उदारवादी हिन्दुत्व दरअसल अध्यात्म पर आधारित था और यही उनकी विचारधारा की विशेषता थी। गोविन्दाचार्य ने कहा कि तिलक के हिन्दुत्व के मर्म को उनकी किताब ‘गीता रहस्य’ का अध्ययन करके समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि उनके स्वराज के नारे और सभी को साथ लेकर चलने की इच्छा ने उन्हें उदारवादी और कट्टरपंथीकहे जाने वाले लोगों में समान रूप से लोकप्रिय बनाया।
महात्मा गांधी तिलक के विचारों से बेहद प्रभावित थे और गांधी के विचार तिलक की सोच का अगला चरण माने जाते हैं जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को आकार दिया था। तिलक बातचीत और विचार-विमर्श को देश की राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल करने का सबसे अच्छा जरिया मानते थे।
प्रख्यात समाजसेवी और लेखक सुभाष गताडे ने तिलक के व्यक्तित्व के बारे में कहा कि वर्ष 1850 में गठित कांग्रेस की गतिविधियां शुरुआत में काफी वर्षों तक सिर्फ सभाओं और सम्मेलनों तक ही सीमित रही थीं लेकिन तिलक ने उसे जनता से जोड़ने की पहल की। गताडे ने कहा कि जब वर्ष 1908 में तिलक को अपने अखबार ‘केसरी में क्रांतिकारियों के समर्थन में लिखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था तो मजदूरों ने जोरदार आंदोलन किया था जिसकी वजह से पूरा मुंबई कई दिन तक बंद रहा था।
उन्होंने बताया कि लोकमान्य तिलक ने कांग्रेस को जन-जन तक पहुंचाया। उन्होंने उदारवादियों के साथ-साथ कट्टरपंथियों का भी समर्थन हासिल किया था। वह राजनीतिक स्तर पर उग्र जबकि सामाजिक सतह पर पुराने मूल्यों को प्रति संरक्षणवादी व्यक्ति थे यही वजह है कि उन्हें नरम और गरम दोनों ही तरह के व्यक्तित्व के लोगों ने अपनाया था।
तिलक द्वारा महाराष्ट्र में गणेश पूजा का चलन शुरू किए जाने पर गोविन्दाचार्य ने कहा कि तिलक का स्पष्ट मत था कि धार्मिक परम्पराओं को किसी स्थान विशेष तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचाना जाना चाहिए।
गताडे ने इस बारे में कहा कि तिलक गणेश पूजा के जरिए हिन्दू चेतना का मूल्यांकन करना चाहते थे। वह न सिर्फ अगड़ी जाति बल्कि पिछड़े वर्ग के लोगों में भी धर्म के प्रति नई चेतना जगाने के इच्छुक थे। वर्ष 1890 में कांग्रेस में शामिल हुए तिलक ने पार्टी के खांटी उदारवादी रवैए का विरोध किया। वह गोपाल कृष्ण गोखले के नरम रुख और विचारों के विरोधी थे। वर्ष 1907 में कांग्रेस के सूरत सम्मेलन के दौरान पार्टी में गरम दल तथा नरम दल के रूप में दो गुट बने और तिलक गरम दल के नेता बन गए।
वर्ष 1908 में मिली छह साल की कैद की सजा काटने के बाद लौटे तिलक ने पार्टी के दोनों गुटों को एकजुट करने की कोशिश की। गताडे ने बताया कि तिलक को महसूस हुआ कि दोनों धड़ों की कलह से कांग्रेस की विचारधारा कमजोर हो रही है लिहाजा उन्होंने अंग्रेजों को इसका फायदा नहीं लेने देने और विचारधारा को मजबूत करने के लिए दोनों गुटों को एकजुट करने की कोशिश की थी।
तेइस जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि में मराठी चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे बाल गंगाधर तिलक कॉलेज में शिक्षा हासिल करने वाले भारतीयों की पहली पीढ़ी के सदस्य थे। उन्होंने भारतीय शिक्षण प्रणाली में सुधार के लिए डेक्कन एजुकेशन सोसायटी का गठन किया था। बकौल गोविन्दाचार्य, तिलक ने नेशनल स्कूलिंग में भारतीयता का खास ख्याल रखा था। स्वतंत्र भारत में एक संघीय सरकार के गठन की हसरत लिए तिलक का एक अगस्त 1920 को निधन हो गया।
भारत माँ के इस सच्चे सपूत को सभी मैनपुरी वासीयों का शत शत नमन |
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11 टिप्पणियाँ

Posted by on जुलाई 31, 2010 in बिना श्रेणी

 

11 responses to “एक रिपोस्ट :- ‘लोकमान्य’ की याद में !

  1. ललित शर्मा

    जुलाई 31, 2010 at 10:12 अपराह्न

    सार्थक लेखन
    बाल गंगाधर तिलक स्वतंत्रता के सच्चे सिपाही थे
    उन्हे मेरा नमन

     
  2. मनोज कुमार

    जुलाई 31, 2010 at 10:18 अपराह्न

    'स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, और हम इसे लेकर रहेंगे' का नारा देकर देश में स्वराज की अलख जगाने वाले बाल गंगाधर तिलक  एक स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, शिक्षक और विचारक थे। उन्होंने देश को आजादी की दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। भारत माँ के इस सच्चे सपूत को शत शत नमन |

     
  3. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    जुलाई 31, 2010 at 10:32 अपराह्न

    तिलक का नारा अऊर देस के स्वतंत्रता आंदोलन में उनका जोगदान इतिहास का ऊ अध्याय है जिसपर समय का धूल जमिए नहीं सकता है. हमरा स्रद्धांजलि!

     
  4. राज भाटिय़ा

    अगस्त 1, 2010 at 12:43 पूर्वाह्न

    भारत माँ के इस सच्चे सपूत को मेरा शत शत नमन,स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, ओर यही नारा हमे मान ओर सम्मान से जीना भी सीखाता है, धन्यवाद इस बहुत ही सुंदर लेख से, ऎ॓से बहुत से लेख हम बचपन मै अपनी कोर्स की किताबो मै पढते थे. आज आप ने फ़िर से याद दिला दिया,

     
  5. मनोज कुमार

    अगस्त 1, 2010 at 1:48 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 01.08.10 की चर्चा मंच में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

     
  6. 'अदा'

    अगस्त 1, 2010 at 5:41 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छी प्रस्तुति…!!

     
  7. संगीता स्वरुप ( गीत )

    अगस्त 1, 2010 at 10:25 अपराह्न

    सार्थक लेख ….स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही को नमन

     
  8. कुमार राधारमण

    अगस्त 1, 2010 at 11:08 अपराह्न

    हम आज़ाद भले हो गए हों,कई प्रकार की मुक्ति की ज़रूरत आज भी देशवासियों को है। उससे उबरने के लिए देश को आज भी तिलक जैसे नेता की दरकार है।

     
  9. Babli

    अगस्त 2, 2010 at 1:49 अपराह्न

    बहुत सुन्दर लिखा है आपने ! उम्दा प्रस्तुती!
    मित्रता दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ!

     
  10. JHAROKHA

    अगस्त 3, 2010 at 11:34 पूर्वाह्न

    aadarniy bal gangadhar tilak ji ke baare me vistrit jaankari dene ke liye bahut bahut dhanyvaad.sarthak prastutikaran.
    poonam

     
  11. महेन्द्र मिश्र

    अगस्त 3, 2010 at 12:18 अपराह्न

    बहुत ही सरगार्वित प्रस्तुति…महामना को याद करने के लिए आभार

     

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