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तुम यह कैसा सुख पाते हो…………………………. ??

02 जून

तुम बाज़ क्यों नहीं आते हो रुलाने से ………..
ज़िन्दगी वैसे भी बहुत कडवी होती है………
ऊपर से तुम आइना दिखाते हो…………….

हम सब को यु रुला रुला कर तुम यह कैसा सुख पाते हो ?

क्यों नहीं लिखते तुम औरो की तरह………

कि सब ठीक चल रहा है ……………..
हर कोई हंस रहा है………….

नहीं है कोई गम किसी को……….

हर किसी का पेट भरा है ………….

क्यों सच लिखते हो………………. ??

बदले में क्या पा जाते हो ……………??

हो कोई जवाब तो जरूर बतलाना ……………….

क्यों हर बार रुला जाते हो …………………??

तुम यह कैसा सुख पाते हो…………………………. ??


( युवा कवि दिलीप को समर्पित )

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20 टिप्पणियाँ

Posted by on जून 2, 2010 in बिना श्रेणी

 

20 responses to “तुम यह कैसा सुख पाते हो…………………………. ??

  1. sangeeta swarup

    जून 2, 2010 at 2:33 अपराह्न

    आपने सच लिखा है….दिलीप ऐसा ही लिखता है की पढने वाले की अंतरात्मा भी हिल जाती है….

     
  2. sanu shukla

    जून 2, 2010 at 2:37 अपराह्न

    bahut sundar….

     
  3. पी.सी.गोदियाल

    जून 2, 2010 at 2:37 अपराह्न

    बहुत बढ़िया शिवम् जी !

     
  4. दिलीप

    जून 2, 2010 at 2:42 अपराह्न

    sir kya karein rulana mera maksad nahi hota mera to bas yahi uddeshya hota hai jo insaan kahin so gaya hai kisi bhi bahane se umad kar jaag jaaye…ab wp aankho se angaara ban ke uthe ya aansu ban ke chalke…bas yahi koshish hai…meri har rachna pehle mujhe khud ke jaagne ke liye likhi hoti hai doosro tak wo baad me pahunchti hogi…meri kalam ne mujhe bahut kuch sikhaya hai….ab un sab par amal karne ja raha hun…samaaj ko badalne ki pratigya kar li hai…jaldi hi shuruaat kar dunga…aap sabhi ko avgat bhi karaunga jaldi hi ki kya socha hai kaise karna hai…sabhi ka sahyog bhi chahiye hoga….waise pehla uddeshya gareebi ke liye kuch karna hi hoga…agar koi vichaar aapke paas ho to wo bhi saamne rakhein …main bhi kabhi kabhi vyathit hota hun…ki beemari par kalam tej chalti hai…par ilaaj ke baare me dubak kar baith jaati hai…ab samjha hun ilaaj ke liye kalam nahi haath paanv chalaane honge…bas ant me yahi kahunga rulana nahi chata…bas wo dekhna aur dikhana chahta hun jo ham dekhna nahi chahte….par jaante hain….aur haan maaf karna hinsi font me nahi likha….software engineer hun na…english jayada jaldi likh pata hun…

     
  5. मनोज कुमार

    जून 2, 2010 at 3:20 अपराह्न

    अच्छी प्रस्तुति!

     
  6. वन्दना

    जून 2, 2010 at 4:30 अपराह्न

    bahut hi umda aur sochniya prashna uthaye hain.

     
  7. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    जून 2, 2010 at 5:13 अपराह्न

    क्यों हर बार रुला जाते हो
    तुम यह कैसा सुख पाते हो

    बहुत बड़ा सवाल है. सुन्दर रचना.

     
  8. अन्तर सोहिल

    जून 2, 2010 at 6:36 अपराह्न

    सच्चाई दिखाती, बहुत अच्छी पोस्ट

    प्रणाम

     
  9. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

    जून 2, 2010 at 7:05 अपराह्न

    प्रश्नवाचक रचना तो बहुत ही बढ़िया रही!

     
  10. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    जून 2, 2010 at 9:12 अपराह्न

    आग भरा हुआ है इस कवि का अंदर… चाहे त चक्रबर्ती राजा होगा नहीं त बुद्ध… आप लोग जवान आदमी हैं देखिएगा… हम जिंदा रहेंगे कि नहीं, पता नहीं…धन्यवाद शुभम बाबू!

     
  11. राज भाटिय़ा

    जून 2, 2010 at 9:38 अपराह्न

    झुठ बोला नही जाता, नकली हंसी हंस नही पाते, ओर सच देख नही जाता….. कोन नही चहाता हंसना, वो मजदुर, वो रिकक्षे वाला, वो बच्चा जो ३० रुपये के लिये सारा दिन धुप मै चाय पहुचाता है…… सभी चाहते है एक हंसी, एक खुशी… लेकिन भुखे पेट केसे???
    आप की कविता बहुत अच्छी ओर सटीक लगी धन्यवाद

     
  12. देव कुमार झा

    जून 2, 2010 at 9:54 अपराह्न

    अच्छा लगा दिलीप के बारें में पढकर…. बहुत ही उम्दा लेखन है दिलीप जी का…. बहुत तरक्की करेगा यह बालक….

     
  13. Shekhar Kumawat

    जून 2, 2010 at 9:54 अपराह्न

    are baba re mujhe to aap se dar lagne laga he kahi aap mera no. na lele

    chalo koi bat nahi achha likha he

    aap ko badhai

    vese sahi ki hamesh sakaratmak sochna chahiye

    me bhiisi koshis me hun

    dhanya wad aap ka

     
  14. राजकुमार सोनी

    जून 2, 2010 at 10:24 अपराह्न

    एक दिन सब कुछ बदलेगा। हालात ठीक होंगे दोस्त। भरोसा रखो। इसके अलावा और क्या कर सकते हैं।

     
  15. पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    जून 2, 2010 at 11:34 अपराह्न

    बेहद उम्दा!

     
  16. दीपक 'मशाल'

    जून 3, 2010 at 12:41 पूर्वाह्न

    सवाल अच्छे हैं पर जवाब मैंने दिए ना.. 🙂

     
  17. Babli

    जून 3, 2010 at 9:57 पूर्वाह्न

    बहुत ही सुन्दर लगा दिलीप जी के बारे में जानकर! प्रश्नों का सिलसिला रखते हुए बेहद उम्दा प्रस्तुती! बहुत बढ़िया लगा!

     
  18. दिलीप

    जून 3, 2010 at 1:22 अपराह्न

    Mujhe itna samman diya Shivam ji…bahut bahut abhaar…aur haan Archana ji ne iske pratyuttar me kaha hai…use bhi yahan post karna chahunga…unse hamesha maatrvat sneh milta rehta hai….unki panktiyan…

    है आग मुझमे इतनी की मै खुद जल जाता हूँ,
    न रुलाऊ किसी को तो खुद भीग जाता हूँ ,

    है जिन्दगी कितनी कड़वी ,
    मै तो सिर्फ चखाता हूँ,

    आईना मै क्या किसी को दिखाउगा,
    मै तो खुद अपना वजूद तलाशता हूँ

    Archana ji ko saadar naman aur sabhi logon ka dhanywaad….

     
  19. kunwarji's

    जून 3, 2010 at 1:34 अपराह्न

    sahi baat ekdam…

    kunwar ji,

     
  20. गिरीश बिल्लोरे

    जून 4, 2010 at 12:46 पूर्वाह्न

    बहुत खूब
    उत्तम अति उत्तम
    ये सवाल गहरा असर छोड़ता है

     

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