RSS

स्वतंत्रा संग्राम में सुरेंद्र नाथ की भूमिका अहम

12 नवम्बर

देश के आजादी के आंदोलन के लिए सशक्त आधार तैयार करने वाले लोगों में से एक सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने नरमपंथी नेता के रुप में सदैव ब्रिटिश शासन का मुखर विरोध किया और देशवासियों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहे।

देश में 1900 के शुरुआती दशकों में कांग्रेस में बनर्जी, गोपालकृष्ण गोखले जैसे नेताओं का बोलबाला था। इनके विचारों और आजादी पाने के तौर तरीकों से आज कई लोग भले ही सहमत न हो लेकिन इन नेताओं ने आजादी के आंदोलन को तेज करने के लिए एक सशक्त जमीन तैयार की। वह अपने विचारों पर कायम रहने वाले नेता थे। इनके इस रुख को ब्रिटेन के राजनीतिज्ञों की टिप्पणी से समझ सकते हैं जिसमें वे बनर्जी को प्राय: ‘सरेंडर नाट बनर्जी अपने पक्ष से नहीं झुकने वाला व्यक्ति’ कहकर पुकारते थे।

इतिहासकार आलोक कुमार के अनुसार सुरेंन्द्र नाथ बनर्जी ने ‘इंडियन नेशनल एसोसिएशन’ की स्थापना की जो अंग्रेजी शासन में शुरुआती राजनीतिक संगठनों में से एक था। बाद में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और उसके प्रमुख नेताओं में से एक थे। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी सहित ये प्रमुख नरमपंथी नेता व्यवस्था के भीतर रहकर बदलाव चाहते थे। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि वह बदलाव के समर्थक नहीं थे। उन्होंने हमेशा भारतवासियों के हितों के लिए कानून में बदलाव की मांग उठाई थी।

सुरेन्द्र नाथ बनर्जी का कांग्रेस पर काफी प्रभाव था और वह 1894 तथा 1904 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। बनर्जी सहित नरमपंथी नेताओं का तिलक के नेतृत्व वाले गरमपंथी नेताओं से इसी बात को लेकर मतभेद था क्योंकि वे [गरमपंथी] व्यवस्था में परिवर्तन चाहते थे और देशवासियों को शासन का अधिकार दिलाना चाहते थे। बनर्जी का जन्म 10 अगस्त 1848 को कलकत्ता में एक संपन्न परिवार में हुआ था। स्नातक करने के बाद वह इंडियन सिविल सर्विसेज [आईसीएस] की परीक्षा में भाग लेने के लिए लंदन गए। उन्होंने परीक्षा पास भी कर ली लेकिन उनकी वास्तविक आयु को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। बाद में एक अदालती फैसले में उनके पक्ष को सही ठहराया गया। बनर्जी ने बाद में फिर यह परीक्षा उत्तीर्ण की और वह सिलहट में सहायक मजिस्ट्रेट बनाए गए।

ब्रिटिश शासन ने बाद में उन पर नस्ली भेदभाव का आरोप लगा कर उन्हें सरकारी नौकरी से हटा दिया। सरकार के इस फैसले का उन्होंने इंग्लैंड जाकर विरोध किया लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। बाद में वह देश में लौटकर अंग्रेजी के प्राध्यापक बन गए। उन्होंने ‘द बंगाली’ नामक समाचार पत्र शुरु किया और 1876 में अपनी तरह के पहले राजनीतिक संगठन इंडियन नेशनल एसोसिएशन की स्थापना की। इसी के साथ उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले नस्लभेद के खिलाफ घूम घूमकर सार्वजनिक भाषण देने शुरु कर दिए।

ब्रिटिश सरकार और अदालतों के खिलाफ भाषण देने के कारण बनर्जी की गिरफ्तारी की गई जिसका देश भर में विरोध हुआ। कांग्रेस की स्थापना होने के बाद बनर्जी ने अपने संगठन का उसमें विलय कर दिया। उन्होंने 1905 के बंगाल विभाजन का जमकर विरोध किया।

अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर में 1909 के मोंटे मर्लो सुधारों को स्वीकार करने जैसे कुछ निर्णयों के कारण ‘नरमपंथी धड़े’ की लोकप्रियता कुछ कम हुई। वह 1923 में बंगाल विधानसभा का चुनाव भी हार गए। बनर्जी को ब्रिटिश राजनीतिज्ञ प्राय: सरेंडर नाट बनर्जी [अपने पक्ष से नहीं झुकने वाला व्यक्ति] कहकर पुकारते थे। उनकी लिखी पुस्तक ‘ए नेशन इन मेकिंग’ काफी चर्चित हुई। इस महान देशभक्त का निधन 1925 में हुआ।

सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से श्री सुरेन्द्र नाथ बनर्जी को शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि !

Advertisements
 
1 टिप्पणी

Posted by on नवम्बर 12, 2009 in बिना श्रेणी

 

One response to “स्वतंत्रा संग्राम में सुरेंद्र नाथ की भूमिका अहम

  1. महफूज़ अली

    नवम्बर 12, 2009 at 12:08 अपराह्न

    bahut achchi jaankaari di hai aapne…..

    achcha laga padh kar…

     

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: