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राहुल की राजनीतिक संवेदना

03 अक्टूबर
इस महीने राहुल गांधी ने गोपनीय रूप से उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के एक गांव में खाना खाया, रात को वहीं ठहरे और वापस दिल्ली चले आए। उत्तर प्रदेश में उनकी ऐसी कई यात्राएं हो चुकी हैं जो उत्तर प्रदेश सरकार को चिढ़ाने के उद्देश्य से ही होती हैं। गरीबों की सेवा राजनीतिक अभिनय नहीं, संवेदनाजन्य मन की पीड़ा है। इसकी अभिव्यक्ति तो महात्मा गांधी ने चंपारण में 1918 में की थी। उन्हे भी क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बिहार की गरीबी के दर्शन के लिए आमंत्रित किया था। वहां की हिला देने वाली गरीबी के अनुभव के बाद उन्हें शोषण और लूट के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा मिली। उन्होंने चंपारन में ही पहला सत्याग्रह किया। गरीबी उन्मूलन व अन्याय के विरुद्ध कारगर संघर्ष के लिए अड़ने और टिकने की आदत बनानी होगी। कांग्रेसजन कहते है कि राहुल गांधी भारत की गरीबी का साक्षात दर्शन करना चाहते है।
गांधीजी से लेकर राष्ट्रीय आंदोलन के सभी नेताओं ने गरीबी देखी ही नहीं थी, उसे भोगा भी था। आजाद भारत में गरीबी अध्ययन के अनेक कमीशन बने। योजना आयोग तो 1952 से गरीबी का ही अध्ययन कर रहा है। भारत की गरीबी, गांवों की उपेक्षा, सड़क, बिजली का अभाव क्या इसे अभी जानना शेष है? जो जानना है वह यह कि इसकी समाप्ति के लिए क्या किया जा रहा है? जिनके हाथ में सत्ता है वे कुछ ठोस उपाय करने की जगह इसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को चिढ़ाने का मुद्दा बनाएं, इसे उचित नहीं कहा जा सकता। भारत सरकार ने भीषण सूखे से जूझ रहे देश को धन जुटाने का सबसे सबल रास्ता सादगी बताया। उस पर अमल शुरू हुआ कि कांग्रेस के सभी सांसद अपने वेतन का 20 फीसदी सूखा राहत कोष में दें। उनके मंत्री और सांसद को पंचसितारा होटल की ठंडी हवा से बाहर किया गया। मितव्ययिता का श्रेय लूटने की होड़ में सत्ताधारी दल ने यह प्रदर्शन किया। यह हास्यास्पद है, क्योंकि सांसदों के ऊपर होने वाले खर्चे में वेतन तो नाममात्र है। राहुल गांधी साधारण श्रेणी में गए, लेकिन उनके सुरक्षा प्रहरी बुलेट प्रूफ गाड़ियों का काफिला लेकर विशेष विमान से उनके आगमन के पूर्व लखनऊ में विराजमान थे। अपने वेतन का 3200 रुपये दान कर देना और डेढ़ सौ करोड़ की विश्व की सर्वाधिक खर्चीली सुरक्षा घेरे में चलना पाखंड नहीं तो क्या है? विदेश राज्य मंत्री ने साधारण श्रेणी को पशुओं की श्रेणी करार दिया तो उन्हे फटकार मिली, लेकिन उसी दिन प्रधानमंत्री ने विशेष विमान में सैकड़ों सहयोगियों, रक्षा कर्मियों के साथ अमेरिका की यात्रा शुरू कर दी। वित्त मंत्री के सादगी मंत्र का इससे बड़ा उपहास क्या होगा? गांधीजी का नाम लेकर सादगी का मंत्र जाप आसान है, लेकिन उसका अनुकरण कठिन है।
मेरे अनुमान से जब राहुल गांधी ने ग्राम प्रधान की पूड़ी-सब्जी खाई, उनके घर में रात गुजारी और वहीं स्नान किया तो उन्हे दिल के किसी कोने में यह बात जरूर कचोट रही होगी कि जिस गरीब देश को चलाने की जिम्मेदारी मुझे लेनी पड़ सकती है उस देश के राजपुरुषों और राजकुमारों पर डेढ़ सौ करोड़ की खर्चीली सुरक्षा क्या तार्किक है? यदि अहम प्रश्न ने उन्हे परेशान नहीं किया तो विश्वास किया जा सकता है कि उनका दलित और गरीब प्रेम रणनीतिक है, हृदय के अंत:स्थल से उपजी संवेदना का हिस्सा नहीं। गांवों में टिकने, ग्रामीणों से घुलमिल जाने का अभिनय उत्तर प्रदेश के कई मुख्यमंत्रियों ने अपने अधिकारियों के अमले के साथ कई बार किया है। जार्ज फनरंडीज ने तो उद्योग मंत्री की हैसियत से अपनी सभी सरकारी बैठकें दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में की हैं, लेकिन बैठक समाप्त होते ही नेता और अफसर गांव की पीड़ा गांव में छोड़कर राजधानी के लिए उड़ जाते थे।
राष्ट्रीय आंदोलन के शाश्वत मूल्यों को कांग्रेस की स्वातंत्रयोत्तर पीढ़ी ने इतना बदरंग किया कि वे निष्प्रभावी हो गए। स्वदेशी, सादगी सांकेतिक विषय हो गए। राजकर्ताओं के मुंह से सादगी का मंत्र मजाक का विषय बन गया है। 1971 की महान विजय के बाद इंदिरा गांधी के कार्यकाल में पेट्रोल के दाम पांच गुना बढ़े थे। देश के लोग कार का उपयोग न्यूनतम करें, इसके लिए वह एक दिन बैलगाड़ी में बैठकर संसद भवन पहुंचीं और दूसरे ही दिन से गाड़ियों का काफिला उनके साथ आने लगा। मोरारजी देसाई अपने निवास से संसद भवन पैदल आने लगे और इस सिलसिले को लगातार पांच वर्ष तक जारी रखा। भारत के तत्कालीन गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्त वेस्टर्न कोर्ट के दो कमरे के फ्लैट से ही गृह मंत्रालय का कामकाज निपटाते रहे। जवाहर लाल नेहरू ने अवध के ताल्लुकेदारों के खिलाफ किसानों, गरीबों का आंदोलन खड़ा किया था। वह अवध की गरीबी का कारण ताल्लुकेदारों की लूटखसोट की प्रवृत्ति को मानते थे, किंतु उनके उत्तराधिकारियों ने अवध में कांग्रेस का नेतृत्व ताल्लुकेदारों के हाथ में थमा दिया। जब कभी बाढ़, सूखा के दर्शन करने हुए तो इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया तक सभी को नींद इन्हीं ताल्लुकेदारों के राजप्रसाद में आती थी।
कुछ लोग खुश हो सकते हैं कि राहुल गांधी ने दलित, उपेक्षित के अहाते में शयन का अभ्यास शुरू किया है। इस तरह का अभ्यास वीपी सिंह ने 1990 में अमेठी के गांवों में शुरू किया था। गरीब की खाट पर सोना, कुएं में से पानी निकालकर स्नान करना, उनसे मांगकर खाना खाना आदि सब किया, लेकिन उन्होंने उनका भाग्य बदलने का सार्थक प्रयास नहीं किया। क्या राहुल गांधी का गांवों में रात्रि प्रवास सत्ता संतुलन बदलने का कोई कारगर प्रयास है? क्या दो-चार गरीब, दलित परिवारों को अपने प्रभाव के प्रयास से कुछ धन दान दिलाकर गरीबी उन्मूलन हो जाएगा अथवा व्यवस्था बदलकर उत्पादन के साधनों की मिल्कियत इन गरीब हाथों में देकर इन्हे सक्षम बनाना होगा? क्या अवध के राजपुत्र राहुल गांधी को कुछ करने देंगे, क्योंकि अवध के सभी राजघराने कांग्रेस में है और राहुल के मित्र हैं।

– मोहन सिंह [लेखक सपा के पूर्व सांसद हैं]
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1 टिप्पणी

Posted by on अक्टूबर 3, 2009 in बिना श्रेणी

 

One response to “राहुल की राजनीतिक संवेदना

  1. पी.सी.गोदियाल

    अक्टूबर 3, 2009 at 12:26 अपराह्न

    अब का कहे , भैया नौटंकी खूब करत लेत है, और ये सुसर्वा हामार लोगन को भी यी नौटंकी खूब भात है ! ज़रा तानिक्वा इस भैयन को कह दो कि इतना ही दम है तो बिहार, झारखंड के नक्सली गाँव माँ तनिक घूमे के दिखलावे !

     

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