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कब सचेत होंगे ??

20 सितम्बर
मालिक के लिए जान की बाजी लगा देने वाले सेवक या नौकरों के किस्से अब पुराने हो गए हैं। निष्ठा और वफादारी की परिभाषा भी बदल चुकी है। मालिक कितना दौलतमंद है, उसके घर में कितने सदस्य हैं। किन कमजोर बिंदुओं से फायदा उठाया जा सकता हैं। वारदात करने का कौन सा समय उपयुक्त रहेगा। नौकरों के दिमाग में ये बातें उथल-पुथल मचाती रहती हैं। वारदातों की जांच में निकले तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है। उद्योगपतियों और बड़े अधिकारियों के घरों में नौकरों द्वारा वारदात करने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। देश की राजधानी में ऐसी कई वारदात हो चुकी हैं और बाकी देश  भी इनसे अछूता नहीं है। नौकर रखने के प्रति जनता को सतर्कता बरतने की अपील करने वाली पुलिस का एक अधिकारी का परिवार स्वयं चूक कर बैठा। रेवाड़ी में तैनात एसपी यमुनानगर के आवास में नियुक्त नौकर उनकी पत्नी और बेटे को बेहोश करके कीमती सामान चुराकर ले गया।
अधिकतर मामलों में यही हो रहा है कि बिना जांच के रखे गए नौकर से जान-माल का खतरा बना रहता है। नौकर को रखते समय जिस चौकसी की अपेक्षा की जाती है, वह बरती नहीं जा रही है। उसका पूरा नाम, पता, पृष्ठभूमि और चरित्र की जानकारी जुटा कर फोटो सहित इसको नजदीकी थाने में जमा करवाना चाहिए। वह पहले कहां काम करता था और वहां से उसने नौकरी क्यों छोड़ दी। इसकी छानबीन भी जरूरी है। कई परिवार अनजान नौकर पर विश्वास कर लेते हैं और पूरे घर को उसी के भरोसे छोड़ देते हैं। घर के बुजुर्गो और बच्चों को नौकर के भरोसे छोड़ कर शहर से बाहर जाना खतरे से खाली नहीं होता। घर में इन सदस्यों को देखकर नौकर की कभी भी नीयत बदल सकती है। मौका मिलते ही वे उन्हें क्षति पहुंचाकर घर का कीमती सामान लेकर चंपत हो जाते हैं। दुष्कर्म और हत्या के कई मामलों में घर का नौकर ही लिप्त पाया गया है। कुछ नौकर चालाकी दिखाते हुए स्वयं वारदात नहीं करते बल्कि किसी गिरोह के माध्यम से इसे अंजाम देते हैं। इन घटनाओं के बावजूद लोग सचेत नहीं हो रहे हैं। चाहे प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से ही नौकर क्यों न आए हों, पूरी तहकीकात के बाद ही उसकी सेवाएं लेने में ही समझदारी है।
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Posted by on सितम्बर 20, 2009 in बिना श्रेणी

 

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