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क्यों हिन्दी पर शर्म ??

16 सितम्बर

बचा रहे इस देह में, स्वाभिमान का अंश।
रखो बचाकर इसलिए, निज भाषा का वंश॥
कथा, कहानी, लोरियां, थपकी, लाड़-दुलार।
अपनी भाषा के सिवा, और कहां ये प्यार॥
निज भाषा, निज देश पर, रहा जिन्हे अभिमान।
गाये हरदम वक्त ने, उनके ही जयगान॥
हिन्दी से जिनको मिला, पद-पैसा-सम्मान।
हिन्दी उनके वास्ते, मस्ती का सामान॥
सम्मेलन, संगोष्ठियां, पुरस्कार, पदनाम।
हिन्दी के हिस्से यही, धोखे, दर्द तमाम॥
हिन्दी की उंगली पकड़, जो पहुंचे दरबार।
हिंदी के ‘पर’ नोचते, बनकर वे सरकार॥
अंग्रेजी पर गर्व क्यों, क्यों हिन्दी पर शर्म।
सोचो इसके मायने, सोचो इसका मर्म॥
दफ्तर से दरबार तक, खून सभी का सर्द।
‘जय’ किससे जाकर कहे, हिन्दी अपना दर्द॥

– जय चक्रवर्ती
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5 टिप्पणियाँ

Posted by on सितम्बर 16, 2009 in बिना श्रेणी

 

5 responses to “क्यों हिन्दी पर शर्म ??

  1. संजय तिवारी ’संजू’

    सितम्बर 16, 2009 at 12:36 पूर्वाह्न

    आपका हिन्दी में लिखने का प्रयास आने वाली पीढ़ी के लिए अनुकरणीय उदाहरण है. आपके इस प्रयास के लिए आप साधुवाद के हकदार हैं.

     
  2. आनन्द वर्धन ओझा

    सितम्बर 16, 2009 at 12:54 पूर्वाह्न

    जिसको न निज भाषा तथा निज देश पर अभिमान है,
    वह नर नहीं नर-पशु निरा है, और मृतक सामान है !
    जय हिंदी ! जय भारत !!

     
  3. Udan Tashtari

    सितम्बर 16, 2009 at 12:59 पूर्वाह्न

    आभार जय चक्रवर्ती जी की इस रचना को प्रस्तुत करने का.

     
  4. राज भाटिय़ा

    सितम्बर 16, 2009 at 1:53 पूर्वाह्न

    आप का धन्यवाद चक्रवर्ती जी की इस रचना को प्रस्तुत करने का.

     
  5. संगीता पुरी

    सितम्बर 16, 2009 at 7:31 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर रचना ..हिन्‍दी के प्रति आपकी भावना बहुत अच्‍छी लगी

     

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