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वेदना

09 सितम्बर


धरती की आँखें भीगी है
और अम्बर भी रोता है
दुनिया में कोई सब पाता है
और कोई सब खोता है
धरती की आँखें भीगी है
और अम्बर भी रोता है
दुनिया में कोई सब पता है
और कोई सब खोता है

झरने हो नदियाँ के सागर
सब है पानी के धारे
लेकिन इन आंखों के आँसू
जैसे पिगले अंगारे
चीख रही है सारी दिशाएं
कोई दिशा खामोश नहीं
दोष नहीं है तेरा लेकिन
फिर भी तू निर्दोष नहीं
डूब ना जाए दुनिया तेरी
आंसू की इस बारिश में
लगता है तेरे दिल और आँखें
दोनों है इस साजिश में

कल तक मुझको गौरव था
मैं देवताओं की हूँ संतान
आज मगर हूँ आधा जानवर
आज हूँ में आधा इंसान
कल तक मेरी धड़कन
धड़कन जीवन राग सुनती थी
लेकिन आज है मेरे अंग अंग में
जैसे ठंडा एक शमशान


कौन पुकारा कौन पुकारा
देखो सब कुछ बदल गया
कोई पीछे छूट गया है
कोई आगे निकल गया
आग के है यह नाग के जो है
लिपटे हुवे मेरे तन से
पैरों से और बाजू से
और सीने से और गर्दन से ||

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4 responses to “वेदना

  1. रंजना.

    सितम्बर 9, 2009 at 2:24 अपराह्न

    बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति….वाह !! मन मुग्ध कर लिया आपकी इस रचना ने…

    (कहीं कहीं टंकण असुद्धियाँ रह गयीं हैं,कृपया उन्हें शुद्ध कर रचना पुनः प्रेषित कर दें)

     
  2. om arya

    सितम्बर 9, 2009 at 3:20 अपराह्न

    bahut hi sundar rachana………..atisundar

     
  3. neeraj gupta

    सितम्बर 9, 2009 at 7:28 अपराह्न

    achi poem hai /….

     
  4. समीर लाल

    सितम्बर 9, 2009 at 11:15 अपराह्न

    बेहतरीन रचना..अच्छी लगी.

     

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