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फ़िर वही परिवारवाद !!!

07 सितम्बर

कांग्रेस नेतृत्व को आंध्र प्रदेश में अपने विधायकों को जिस तरह यह संदेश देना पड़ा कि वे मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के निधन के बाद उनके उत्तराधिकारी के चयन के संदर्भ में तब तक धैर्य धारण करें जब तक राजकीय शोक की निर्धारित अवधि समाप्त नहीं हो जाती उससे भारतीय राजनीति का एक स्याह पहलू उजागर हो गया। यह बेहद अरुचिकर है कि राजशेखर रेड्डी का अंतिम संस्कार होने के पहले ही आंध्र प्रदेश के विधायकों के एक समूह ने दिवंगत मुख्यमंत्री के बेटे जगनमोहन रेड्डी को सत्ता की कुर्सी पर बैठाने के लिए लामबंदी शुरू कर दी। कांग्रेस विधायकों की ओर से जगनमोहन के पक्ष में जिस तरह की लामबंदी की गई उससे एक बार फिर यह प्रकट हुआ कि भारतीय राजनीति में परिवारवाद और सामंतशाही के तत्व कहीं अधिक गहरे विद्यमान हैं। पिता के स्थान पर पुत्र को उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानना तो बीते जमाने की बात है। एक परिपक्व लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को यह शोभा नहीं देता कि वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजसी परंपराओं को आगे बढ़ाता हुआ दिखाई दे। जगनमोहन रेड्डी एक सक्षम राजनेता और योग्य प्रशासक हो सकते हैं, लेकिन यह तो एक तथ्य है ही कि अभी उन्हें अपने इन गुणों को साबित करना शेष है। आंध्र प्रदेश, कांग्रेस और राजनीति के लिए उचित यह होगा कि वाई एस राजशेखर रेड्डी के उत्तराधिकारी का चयन राजनीतिक-प्रशासनिक योग्यता और क्षमता के मानकों के आधार पर किया जाए।

इसमें संदेह नहीं कि आंध्र प्रदेश के ज्यादातर कांग्रेसी विधायक राजशेखर रेड्डी के प्रति निष्ठावान थे, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे उनके बेटे को उनका स्वाभाविक उत्तराधिकारी करार दें और इसके लिए विधिवत अभियान भी छेड़ दें-वह भी राजकीय शोक की अवधि समाप्त होने के पहले ही। यह अच्छा हुआ कि कांग्रेस नेतृत्व ने इस मामले में हस्तक्षेप किया, अन्यथा सात दिन का राजकीय शोक एक विचित्र माहौल की प्रतीति कराता। देखना यह है कि शोक की अवधि समाप्त होने के बाद आंध्र प्रदेश में उत्तराधिकार के प्रश्न को किस तरह सुलझाया जाता है? यह ठीक है कि कांग्रेस विधायकों का एक बड़ा वर्ग राजशेखर रेड्डी के पुत्र को मुख्यमंत्री बनाने की तरफदारी कर रहा है, लेकिन इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती उन्हें मात्र चंद महीनों का ही राजनीतिक अनुभव है। सांसद होने के अलावा फिलहाल जगनमोहन की एकमात्र राजनीतिक योग्यता उनका राजशेखर रेड्डी का पुत्र होना है। यह समझ आता है कि राजशेखर रेड्डी के निधन के बाद उनके परिवार के प्रति सहानुभूति की लहर उमड़ी है, लेकिन शासन के मामले सहानुभूति के आधार पर नहीं तय किए जाने चाहिए। आखिर ऐसा भी नहीं कि राजशेखर रेड्डी के निधन से जो स्थान रिक्त हुआ है उसे केवल उनके परिजन ही भर सकते हैं। वास्तव में आंध्र प्रदेश में अनेक ऐसे कांग्रेस नेता हैं जिनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव भी है और शासन चलाने की योग्यता भी। यह तो कांग्रेस नेतृत्व को ही तय करना है कि वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए किसका चयन करता है, लेकिन उसे सहानुभूति लहर के आधार पर फैसला करने से बचना होगा।

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2 टिप्पणियाँ

Posted by on सितम्बर 7, 2009 in आज के नेता

 

2 responses to “फ़िर वही परिवारवाद !!!

  1. Isht Deo Sankrityaayan

    सितम्बर 7, 2009 at 2:32 अपराह्न

    जहां तक कॉंग्रेस है वहां तक परिवारवाद है और जहां तक परिवारवाद है वहां तक कांग्रेस है. इसमें आप कुछ नहीं कर सकते और अब वोट से भी सरकार नहीं बदल सकते, क्योंकि ईवीएम आ चुका है.

     
  2. विनय

    सितम्बर 7, 2009 at 4:37 अपराह्न

    अच्छा लेख है

    BlueBird

     

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