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उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त गोरखधंधा – संस्थानों की मान्यता पर सवाल

05 सितम्बर

उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कैसा गोरखधंधा व्याप्त है, इसका प्रमाण है तकनीकी शिक्षा से संबंधित कुछ संस्थानों की मान्यता पर सवाल उत्पन्न होना। ऐसे दो संस्थानों को जिस प्रकार अनुचित तरीके से मान्यता मिल गई उससे यह भी पता चल रहा है कि इस गोरखधंधे में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद और उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारी भी शामिल थे। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद यानी एआईसीटीई का कामकाज पहले भी सवालों के घेरे में आ चुका है। चूंकि अनुचित तरीके से मान्यता प्रदान करने के इस प्रकरण में यूपीटीयू के कुछ अधिकारियों की संलिप्तता के तथ्य भी सामने आ रहे हैं इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि इस विश्वविद्यालय को दुरुस्त करने के उपाय किए जाएं। अब जब सीबीआई एआईसीटीई की उस कमेटी में शामिल सदस्यों के खिलाफ सबूत जुटा रही है जिन्होंने शैक्षणिक संस्थानों को संबद्धता प्रदान करने में मनमानी की तब उत्तर प्रदेश सरकार को यह देखना चाहिए कि किन परिस्थितियों में यूपीटीयू के निरीक्षण दल ने भी एआईसीटीई की रपट पर अपनी मुहर लगा दी?

इस प्रकरण में न केवल इसकी जांच होनी चाहिए कि किन स्थितियों में यूपीटीयू जांच के घेरे में आए संस्थानों द्वारा की जा रही गड़बड़ियों का पता नहीं लगा सका, बल्कि यह भी आवश्यक है कि दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई भी की जाए। यह हैरत की बात है कि फर्जी भूमि और भवन के आधार पर शैक्षणिक संस्थानों को मान्यता प्रदान कर दी गई। यूपीटीयू के कामकाज के संदर्भ में चूंकि यह भी सामने आ रहा है कि कालेजों के निरीक्षण के लिए इस विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारी और शिक्षक उतावले रहते हैं इसलिए इसकी भी आशंका उत्पन्न हो जाती है कि जैसी गड़बड़ियां इन दो संस्थानों में की गईं वैसा ही कुछ अन्य संस्थानों में भी हो रहा होगा। यह सामने आना किसी को भी आश्चर्य में डाल सकता है कि ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि यूपीटीयू ने किसी कालेज का निरीक्षण करने के बाद कालेज खोलने के प्रस्ताव से असहमति जताई हो। क्या यह मान लिया जाए कि यूपीटीयू में मान्यता के लिए जो भी आवेदन किए जाते हैं वे सभी मानकों को पूरा करने वाले होते हैं?

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1 टिप्पणी

Posted by on सितम्बर 5, 2009 in बिना श्रेणी

 

One response to “उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त गोरखधंधा – संस्थानों की मान्यता पर सवाल

  1. राज भाटिय़ा

    सितम्बर 5, 2009 at 6:02 अपराह्न

    पहले पाठशाला मंदिर नही एक दुकान बन जाये तो यही होगा.बहुत सुंदर लिखा आप ने आप की बात से सहमत हुं

     

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