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खतरे की आहट

31 जुलाई

उत्तर प्रदेश में सूखाग्रस्त 47 जिलों के संदर्भ में यह जो सामने आया कि उनमें से 33 जिलों में जल के अति दोहन के कारण सिंचाई तो दूर जनता को पेयजल की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है वह एक प्रकार से करेला और वह भी नीम चढ़ा वाली कहावत को चरितार्थ करता है, क्योंकि यदि अगले कुछ दिनों में बारिश नहीं होती है तो सूखे का संकट और अधिक बढ़ना तय है। चूंकि इन जिलों में अति दोहन के कारण भूमिगत जल का स्तर और अधिक नीचे चला गया है इसलिए सरकारी तंत्र के लिए सिंचाई और पेयजल संकट दूर करना मुश्किल हो सकता है। राज्य सरकार को इस स्थिति से अवगत होना ही चाहिए था कि किन हिस्सों में भूमिगत जल स्तर गिरता चला जा रहा है? यदि शासन-प्रशासन की ओर से इस संदर्भ में समय रहते कारगर कदम उठाए गए होते तो अवर्षण की स्थिति में भी सूखे के संकट को और अधिक गंभीर होने से रोका जा सकता था। यह निराशाजनक है कि कुछ हिस्सों में भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन की प्रवृत्ति से परिचित होने के बावजूद ऐसे कदम नहीं उठाए गए जिनसे भूमिगत जल स्तर को और अधिक नीचे जाने से रोका जा सकता। यह आश्चर्यजनक है कि न तो अति दोहन को रोकने के उपाय किए गए और न ही वर्षा जल के संचयन और संरक्षण की दिशा में ठोस काम किया गया। यह सही समय है जब राज्य सरकार को भूमिगत जल स्तर को रोकने के लिए युद्ध स्तर पर कोई कार्रवाई आरंभ करनी चाहिए, अन्यथा आने वाले समय में सूखे के संकट का सामना करना और अधिक दुष्कर हो सकता है। इसके साथ ही इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि नलकूपों की संख्या लगातार क्यों बढ़ती जा रही है? इस तथ्य से परिचित होने के बाद कि नलकूपों की भूमिगत जल स्तर गिराने में मुख्य भूमिका है, ऐसे प्रयास किए ही जाने चाहिए कि नलकूपों की संख्या घटे और सिंचाई के लिए उनके विकल्प की मदद ली जाए। इसी के साथ ही राज्य सरकार को इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि जो सिंचाई परियोजनाएं लंबे समय से लंबित हों वे यथाशीघ्र पूरी हों। आवश्यक तो यह है कि सूखे से प्रभावित जिलों में ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में भूमिगत जल के स्तर को सुधारने के उपाय किए जाएं।

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Posted by on जुलाई 31, 2009 in बिना श्रेणी

 

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