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‘आईएनएस अरिहंत’ — पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी का जलावतरण

26 जुलाई

देश में ही निर्मित पहली परमाणु संपन्न पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत को भारतीय नौसेना में शामिल करने के साथ ही देश ने आज नौसेना के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर पार कर लिया।

हालांकि इस मौके पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्पष्ट किया कि भारत के किसी तरह के आक्रामक इरादे नहीं हैं, लेकिन अपनी हिफाजत के लिए वह तमाम उपाय करेगा। उन्होंने कहा कि भारत के सुरक्षा हितों के परिप्रेक्ष्य में समुद्र की भूमिका तेजी से प्रासंगिक होती जा रही है और इस बदलते माहौल में हमें हमारी सैनिक तैयारियों को नए सिरे से समायोजित करना होगा। उन्होंने कहा कि इस संबंध में हमारी नौसेना पर भारी जिम्मेदारी है। पनडुब्बी के अवतरण के सांकेतिक आयोजन के तौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरण कौर ने यहां गुप्त नौसैनिक ठिकाने मत्स्य की गोदी में पनडुब्बी के आवरण पर नारियल फोड़ा और पूजा अर्चना की। इसके साथ ही भारत स्वनिर्मित परमाणु संपन्न पनडुब्बी वाले गिने चुने देशों की कतार में शामिल हो गया।

पूजा के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, रक्षा मंत्री एके एंटोनी, नौसेना प्रमुख एडमिरल सुरीश मेहता और आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की मौजूदगी में गुरशरण ने एक पट्टिका का अनावरण किया जिस पर 112 मीटर लंबी पनडुब्बी का नाम लिखा था। इसके साथ ही भारत की जल, थल और वायु से परमाणु शक्ति युक्त प्रक्षेपास्त्र दागने की क्षमता का उद्घोष करते हुए गुरशरण कौर ने कहा कि मैं इसका नाम आईएनएस अरिहंत [दुश्मन का विनाश करने वाला] रखती हूं। पनडुब्बी को शुभकामनाएं।

प्रधानमंत्री ने इसे ‘देश की रक्षा तैयारियों के लिहाज से एक ऐतिहासिक मील का पत्थर’ बताते हुए कहा कि हमारे कोई आक्रामक तेवर नहीं हैं और न ही हम किसी को डराना चाहते हैं। हम अपने क्षेत्र और उससे आगे एक ऐसा माहौल चाहते हैं जो हमारे शांतिपूर्ण विकास तथा हमारे मूल्य तंत्र के संरक्षण में सहायक हो।

प्रधानमंत्री सिंह ने कहा कि अपने देश की सुरक्षा के लिए सभी जरूरी उपाय करना और दुनिया भर में हो रही तकनीकी प्रगति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की जिम्मेदारी हमारी है। इस महत्वपूर्ण नौसैनिक उपलब्धि के साथ ही भारत अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन जैसे विशिष्ट देशों के क्लब में शामिल हो गया है, जो परमाणु पनडुब्बी विकसित करने की क्षमता रखते हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज हम पांच देशों के उस चुनिंदा समूह में शामिल हो गए हैं, जिसके पास परमाणु संपन्न पनडुब्बी बनाने की क्षमता है। एडवांस्ड टेक्नोलोजी वैसल [एटीवी] नामक कूट नाम वाली यह पनडुब्बी ‘सागरिका‘ [के 15] प्रक्षेपास्त्र से लैस होगी, जिसकी मारक क्षमता 700 किलोमीटर है।

भारत परमाणु हथियारों कापहले इस्तेमाल नहींकरने की घोषणा कर चुका है और इसी के मद्देनजर देश की हथियार प्रणाली में जवाबी कार्रवाई के लिए पहले हमले को झेलने की क्षमता होनी चाहिए, इसलिए अरिहंत का मुख्य हथियार इसकी मारक क्षमता है। यह समुद्र में आधे किलोमीटर की गहराई या उससे अधिक में रहकर समुद्र के भीतर से मिसाइल दागने में सक्षम है। छह हजार टन की पनडुब्बी में 85 मैगावाट क्षमता का परमाणु रिएक्टर है और इसकी सतह पर गति 12 से 15 नोट्स तथा पानी में गति 24 नोट्स तक जा सकती है। इस पनडुब्बी में 95 लोग सवार होंगे तथा यह तारपीडो और 12 बैलेस्टिक मिसाइलों समेत अन्य मिसाइलों से लैस होगी। इस श्रेणी की चार और परमाणु पनडुब्बियों के लिए पहले ही सरकार की मंजूरी मिल चुकी है और इन्हें आने वाले सालों में नौसेना की पानी के भीतर मारक क्षमता में इजाफे के लिए शामिल किया जाएगा।

पनडुब्बी के समुद्री परीक्षण विशाखापत्तनम तट पर बंगाल की खाड़ी में किए जाएंगे जहां पिछले दो दशक से इस पोत का निर्माण किया जा रहा था। 30 हजार करोड़ रूपये की लागत से यह गोपनीय परमाणु पनडुब्बी परियोजना 1980 के दशक में शुरू की गई थी। हालांकि इसका सपना तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1970 के दशक में देखा था। इस परियोजना के पूरा होने के चरण में पहुंचने की पहली आधिकारिक स्वीकारोक्ति इस वर्ष फरवरी में की गई जब एंटनी ने बेंगलूरू में एयरो इंडिया शो के दौरान इसकी घोषणा की। सिंह ने कहा कि यह हमारे लिए अनिवार्य है कि देश की सुरक्षा और दुनिया में हो रही तकनीकी प्रगति के साथ तारतम्य स्थापित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि आजादी कायम रखने के लिए सतत चौकसी अनिवार्य है। सिंह ने देश की रक्षा तैयारियों में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने के लिए कार्यक्रम से जुड़े हरेक व्यक्ति को बधाई दी और कहा कि आज का जलावतरण देश में मौजूद प्रौद्योगिकी कुशलता और हमारे अनुसंधान एवं विकास संगठनों की क्षमता प्रकट करता है।

उन्होंने कहा कि जलावतरण से हमारे प्रौद्योगिकीविदों, वैज्ञानिकों और रक्षाकर्मियों की प्रतिबद्धता और देशभक्ति की भावना स्पष्ट होती है जिन्होंने रक्षा प्रौद्योगिकी के सर्वाधिक उन्नत क्षेत्रों में देश की आत्मनिर्भरता के लिए विभिन्न बाधाओं को पार किया। सिंह ने कहा कि पनडुब्बी का निर्माण चुनौती भरा कार्य था और अपनी पहली परमाणु पनडुब्बी विकसित करना देश की विशेष उपलब्धि है।

पनडुब्बी के निर्माण में सार्वजनिक और निजी भागीदारी पर खुशी जताते हुए सिंह ने कहा कि मैं इस बात से विशेष तौर पर खुश हूं कि यह पनडुब्बी सार्वजनिक निजी भागीदारी का सार्थक नतीजा है। भारत में पिछले कुछ दशकों के दौरान निजी उद्योग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और हमें अपने रक्षा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उसकी क्षमता का लाभ उठाना चाहिए।

मास्को से मिले सहयोग की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं अपने रूसी मित्रों की सराहना करना चाहूंगा जिन्होंने इस दिशा में सतत और अमूल्य सहयोग किया जो रूस के साथ हमारे करीबी सामरिक सहयोग को प्रकट करता है।

नौसेना की जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री सिंह ने कहा कि सरकार राष्ट्रीय अखंडता और अपने हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि सरकार सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण के लिए हरसंभव मदद करेगी। इस मौके पर रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने भारत की पहले हमला न करने और परमाणु हथियार का पहले इस्तेमाल ने करने की नीति का जिक्र करते हुए कहा कि क्षेत्र के हालात ने एक सक्षम पलटवार प्रणाली की जरूरत पैदा कर दी थी।

मेहता ने कहा किआईएनएस अरिहंत का जलावतरण परमाणु तिकड़ी की तीसरी कड़ी की तरफ बढ़ने का पहला ठोस कदम है। उन्होंने कहा कि इससे नौसेना को व्यापक भौगोलिक इलाके की घटनाओं को निर्णायक ढंग से प्रभावित करने और हर तरह के टकराव से निपटने में मदद मिलेगी। भारत के पास जमीनी परमाणु आयुध ले जाने में सक्षम अग्नि बैलेस्टिक मिसाइल है। यह भारतीय वायुसेना के उन लड़ाकू विमानों से अलग है जिनमें परमाणु हथियार प्रक्षेपित करने में सक्षम मिराज 2000 जैसे विमान शामिल हैं। दो दशक पहले भारत ने चार्ली श्रेणी की परमाणु पनडुब्बी का संचालन किया था। 1989 से 1991 के बीच रूस से लीज पर ली गई इस पनडुब्बी का नाम आईएनएस चक्र रखा गया था। मास्को एक बार फिर से अकुला श्रेणी की दो परमाणु पनडुब्बियां भारत को दस साल के लिए लीज पर देगा। इस पनडुब्बियों को इस वर्ष जून में दिए जाने की योजना थी लेकिन पिछले वर्ष के अंतिम दिनों में समुद्री परीक्षण के दौरान हुए हादसे के चलते यह टल गया। लेकिन रूस द्वारा मरम्मत के बाद इन पनडुब्बियों को इस माह के शुरूआत में फिर से समुद्री परीक्षण के लिए उतारे जाने से इनके 2010 में मिलने की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

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Posted by on जुलाई 26, 2009 in बिना श्रेणी

 

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