सुखोई में उड़ान भर राष्ट्रपति ने रचा इतिहास !!

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने बुधवार को सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से उड़ान भर कर अपने नाम एक रिकॉर्ड दर्ज करा लिया। रूस निर्मित सुखोई में 30 मिनट की उड़ान भर कर प्रतिभा ऐसा करने वाली किसी भी देश की पहली महिला राष्ट्राध्यक्ष बन गई हैं।

उड़ान के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर लोहेगांव वायुसैनिक अड्डे पर उतरने के बाद प्रतिभा ने पायलट विंग कमांडर एस साजन से हाथ मिलाया और सुविधाजनक उड़ान के लिए उनकी सराहना की।

इसके साथ ही चौहत्तर वर्षीय प्रतिभा ने किसी भी युद्धक विमान में 30 मिनट की यात्रा करने वाली सबसे उम्रदराज महिला का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया है। अड्डे पर उन्होंने पायलट,च्उच्चाधिकारियों और विमान के तकनीकी स्टॉफ के साथ फोटो खिंचवाए। प्रतिभा के साथ जाने वाले पायलट साजन के पास 3,200 घंटों की उड़ान का अनुभव है।

उड़ान से उतरने के बाद राष्ट्रपति को विश्राम गृह ले जाया गया, जहां उनका चिकित्सीय परीक्षण किया गया। उड़ान भरने के पूर्व राष्ट्रपति को आपातकालीन निर्गमन प्रक्रिया और सुखोई-30 की उड़ान के विभिन्न पहलुओं के बारे में 30 स्क्वॉड्रन ‘राइनोज’ ने संक्षिप्त जानकारी दी।

सुखोई में उड़ान भरने वाली प्रतिभा देश की दूसरी राष्ट्रपति हैं। इसके पहले पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने लोहेगांव से ही इसमें उड़ान भरी थी। कलाम की 30 मिनट की उड़ान की गति सुपरसोनिक गति से थोड़ी ही कम थी। सह पायलट की सीट पर बैठीं प्रतिभा ने इसके लिए विशेष ‘जी-सूट’ पहना, जो अत्यधिक गति के दौरान गुरुत्वाकर्षण विरोधी प्रभाव से बचाता है। भारत का अत्याधुनिक लड़ाकू विमान सुखोई आठ टन तक वजनी युद्ध सामग्री लेकर एक बार के ईंधन में 3,000 किमी तक की दूरी तय कर सकता है। एक बार हवाई ईधन भर कर यह विमान 5,000 किमी तक की दूरी तय कर सकता है।

सशस्त्र बलों की मुखिया राष्ट्रपति को ले जा रहे विमान के साथ दो और सुखोई विमानों ने उड़ान भरी। लड़ाकू सैनिकों की वेशभूषा और हेलमेट पहने हुईं प्रतिभा का कॉकपिट में दाखिल होने के पूर्व भव्य स्वागत किया गया।

विमान को विंग कमांडर साजन ने 0.9 माच की सबसोनिक गति से उड़ाया, जो 1,000 किमी प्रति घंटा की गति से थोड़ी कम थी। सुपरसोनिक गति का स्तर एक माच :1,236 किमी प्रति घंटा: से शुरू होता है। उड़ान के पूर्व प्रतिभा का चिकित्सीय परीक्षण किया गया, जिसमें फिट साबित होने के बाद उन्हें उड़ान के लिए हरी झंडी मिली।

….ताज फिर भी सरताज है

गेट वे आफ इडिया की तरफ तिरछी निगाहो से देखते होटल ताज के सामने आज कुछ भीड़ उत्सुक तमाशबीनों कीहै या फिर जुटे है गेट वे पर रोज चहलकदमी करने वाले मुंबईकर। अगर उत्सुकता और यादों को पूरे दृश्य से निकाल दिया जाए तो एक साल पहले आज के ही दिन गेट वे और ताज में से किसी को यह अंदाज भी नहीं था कि उनके इतिहास में ठीक अड़तालीस घटे बाद एक अजीबोगरीब पन्ना जोड़ने वाले दस लोग उनकी मुंबई से कुछ ही दूर तैर रहे है। वह ऐसा इतिहास छोड़ जाएंगे जो कोई शहर, कोई इमारत और कोई देश अपने साथ जोड़ना नहीं चाहता। मगर इतिहास में रचे-बसे और रमे ताज को यह तमगा भी मिलना था कि जब दुनिया आतंक को याद करेगी तब स्मृति में शेष डब्ल्यूटीसी, मैरियट या ओक्लोहामा सिटी बिल्डिग के साथ मुंबई के ताज होटल के जलते गुंबद भी उसकी यादों में तैर जाएंगे।

ताज अगर मुंबई का गौरव है तो पूरी दुनिया के लिए आतंक के जघन्य चेहरे की पहचान भी। यह ताज के इतिहास की विलक्षण असंगति है। बुधवार यानी 25 नवंबर से 26 नवंबर तक अलग-अलग आयोजनों में मुंबई व ताज के उस महज एक साल पुराने ताजा इतिहास को याद करने वाली है जिसे देश ने विस्मय, भय, यंत्रणा, क्षोभ और करुणा के साथ करीब 60 घटे तक देखा था। आतंक की आधी झेलने वाली ताज की हेरिटेज यानी पुरानी बिल्डिग के ऊपर की अधिकाश मंजिलें अभी बंद है। गुंबद पर रोशनी है, मगर नीचे के तलों पर उदास अंधेरा है। ताज चुपचाप उन निशानों को मिटाने की कोशिश कर रहा है, जो आतंकी उसे देकर गए है। सुनते है, जनवरी में ताज का यह विंग मेहमानों के लिए खुलेगा।

आतंक के निशान भले ही मिट जाएं मगर इतिहास बड़ा जालिम है। वह अच्छा हो या बुरा, मगर चिपक कर बैठ जाता है और मिटता नहीं। लेकिन आखिर एक इमारत में कितना इतिहास भरा जा सकता है। ताज जैसी इमारतें दुनिया में बिरली ही होंगी जिनसे इतिहास इतने विभिन्न तरह के प्रसंगों में बोलता है।

विदेश न जा पाने वाले लोगों के लिए सौ साल पहले मुंबई का ताज होटल एक अविश्वसनीय इमारत थी। उम्र में गेट वे आफ इडिया से भी बड़ा ताज भारत का पहला भव्य होटल था। मुंबई में बिजली से जगमगाने वाली पहली इमारत, मुंबई में आइसक्रीम बनाने की पहली मशीन, पहली लाड्री, पालिश करने की पहली मशीन, पहली लिफ्ट, पहला जेनरेटर..और भी बहुत कुछ मुंबई को उस ताज होटल ने दिखाया जिसे बनाने की योजना सुन कर जमशेद जी की बहनें चौंक कर यह पूछ उठीं थी क्या तुम सच में एक भटियारखाना बनाओगे? खाना खाने की जगह!!

1903 में जनता के लिए खुले ताज होटल को लेकर टाटा परिवार ने कभी यह नहीं सोचा था कि 2008 में ताज के इतिहास में एक ऐसा पन्ना जुड़ेगा जिससे मुंबई की दृश्यावली की पहचान बन चुके इस जीवंत इतिहास को दुनिया में आतंक के निशाने के तौर पर भी जाना जाएगा। वक्त ने बिना मागे ताज को यह इतिहास भी बख्श दिया है।

गुरुवार को ताज के सामने मुंबईकर आतंक के उस इतिहास को याद करेगे लेकिन शायद इस गर्व के साथ कि डब्ल्यूटीसी और मैरियट अब इतिहास में शेष है, मगर आतंक से जूझ कर भी ताज सिर उठाये खड़ा है। साहस और गरिमा के साथ।

हमले की बरसी पर बिखरे हिफाजत देने वाले हाथ !!

मुंबई को आतंक की बरसी पर यह नहीं चाहिए था। वह तो अपनी पुलिस में एकजुटता और मजबूती तलाश रही थी। लेकिन हमले से ठीक पहले उसकी पुलिस राजनीति में उलझ कर बिखर गई। मंगलवार को जब गोरेगाव के एसआरपीएफ ग्राउड में महाराष्ट्र पुलिस में एनएसजी की तर्ज पर बनी त्वरित कार्रवाई बल ‘फोर्स वन’ अपनी दमखम दिखा रही थी, मुंबई की जनता अपनी पुलिस की ताकत नहीं बल्कि पुलिस के बिखराव पर चर्चा कर रही थी। हो भी क्यों न, जहा पूर्व पुलिस कमिश्नर अब्दुल गफूर को पुलिस अधिकारियों के साहस पर शक हो और पिछले साल के हमले दौरान मराठी पुलिस व गैर मराठी पुलिस वालों की बहादुरी की तुलना हो रही हो, वहा फोर्स वन से जनता के भरोसे को फोर्स आखिर कैसे मिले।

मुंबई को मंगलवार से त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा मिल रहा है। लेकिन इस घेरे को बनाने वाले खुद ही अह, स्वार्थ और असमंजस से घिरे है। हालत यह है कि बरसी पर पुलिस को एकजुट करने के बजाय राज्य के गृहमंत्री आरआर पाटिल खुद गफूर के खिलाफ मुकदमे के लिए अधिकारियों को इजाजत देने के हामी है। यानी कि मोर्चे बंधने लगे है। गोरेगाव के एसआरपीएफ मैदान में आयोजन के दौरान इलीट पुलिस और आम पुलिस के बीच नजरिए का अंतर साफ देखा जा सकता था। आपसी ईष्र्या का आलम यह है कि फोर्स वन में नियुक्ति के मानदंडों तक पर सवाल उठ रहे है। साथ ही उनमें चयनित पुलिस वालों को मिल रहे प्रशिक्षण और सुविधाओं से मुंबई पुलिस के दूसरे अधिकारी और सिपाही क्षुब्ध है। गोरेगांव स्थित स्पेशल रिजर्व पुलिस बल में मंगलवार को आयोजित कार्यक्रम में डयूटी पर तैनात मुंबई पुलिस के जवान तो साफ कह रहे थे कि सबसे पहले मरना तो हमें है, लेकिन सुविधाएं और प्रशिक्षण कुछ खास लोगों को दिया जा रहा है।

मुंबई चलती रहती है मगर पिछले साल की याद कर लोग सहमे है। मुंबई में 18 साल से टैक्सी चला रहे दतिया के दिनेश शुक्ला हों या फिर मराठी मानुष अमित मोरे, दोनों ही एक बात पर राजी है कि आतंकी हमले करे तो रोकना मुश्किल होगा। पुलिस या सरकार पर इस कदर अविश्वास क्यों.? दिनेश शुक्ला कहते है कि राज ठाकरे के लंपट गुंडों को तो यह पुलिस रोक नहीं पाती, फिर भला एके-47 लिए आतंकियों से क्या निपटेगी। दूसरी तरफ अमित मोरे सीधे बाहरी यानी दूसरे प्रांतों से आए लोगों का मुद्दा उठाते है। वह कहते है कि कितने आतंकी या उनके हमदर्द यहां छिपे बैठे है। पेशे से एक निजी बैंक में प्रबंधक मोरे साथ ही सफाई भी देते है कि उनकी चिंता के मूल में बाहर से काम की तलाश में आने वाले लोग नहीं, बल्कि उनकी आड़ में मुंबई के भी क्षेत्र विशेष में इकट्ठा हो रहे लोग है।

नौकरीपेशा या रोजमर्रा काम के लिए निकलना वाला हर शख्स खौफजदा है और बस काम पूरा कर जल्दी से जल्दी घर की चारदीवारी में घुस जाना चाहता है। यूं चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात है सादी वर्दी में जगह-जगह खुफिया बल भी है। दरअसल, मुंबई हमले के एक साल तक भी भारतीय एजेंसियां या मुंबई पुलिस डेविड हेडली और तहव्वुर हुसैन राणा के बारे में कुछ पता न कर सकीं, उससे भी लोगों का अविश्वास पुलिस पर बढ़ा है। बी काम कर रहीं वासंती युके भी मानती हैं कि मुंबई को आतंकियों की नजर से भगवान ही बचा सकता है। नेताओं से तो कोई उम्मीद पहले ही नहीं थी, अब पुलिस भी जैसे लड़ रही है, उसमें तो आतंकी फायदा उठाएंगे ही।

दरअसल, शुक्ला, मोरे या वासंती की चिंता बेवजह ही नहीं है। मुंबई पुलिस कमिश्नर अब्दुल गफूर ने आतंकी हमले की बरसी से ठीक पहले विवादास्पद बयान देकर पुलिस के भीतर चल रही जंग को सतह पर ला दिया है। मामला राजनीतिक हलकों में पहुच गया है। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में मुख्यमंत्री व गृह मंत्री को गफूर के नजरिए पर उठे सवालों के जवाब ढूढे़ नहीं मिले। गफूर का बयान अगर सही है तो पुलिस अधिकारियों की निष्ठा और क्षमता समझी जा सकती है और अगर गलत है तो फिर मुंबई पुलिस की एकजुटता का ऊपर वाला ही मालिक है।

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मुंबई की सुरक्षा के लिए आज से तैनात फोर्स वन

देश में एनएसजी की तर्ज पर पहला त्वरित बल देने वाले पहले राज्य का तमगा मंगलवार को महाराष्ट्र ने हासिल कर लिया। गोरेगांव स्थित स्पेशल रिजर्व पुलिस फोर्स मैदान में मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण व गृह मंत्री आरआर पाटिल ने औपचारिक रूप से फोर्स वन को महाराष्ट्र की सुरक्षा में तैनात करने का ऐलान किया। हेलीकाप्टर समेत 216 कमांडों से सुसज्जित फोर्स वन का पहला बैच हमले की बरसी से पहले सुरक्षा में तैनात कर दिया गया। इस मौके पर कमांडों ने अपने युद्धकौशल और आतंकियों से विभिन्न हालात में निपटने की तकनीक कौशल का भी प्रदर्शन किया।

महाराष्ट्र सरकार का दावा तो है कि फोर्स वन का प्रशिक्षण व क्षमता बिल्कुल एनएसजी सरीखी है, लेकिन यह बड़बोलापन ज्यादा है। वास्तव में क्यूआरटी को आम पुलिस वालों की तरह तीन शिफ्टों में तैनात किया जा रहा है, जबकि त्वरित बल तो 24 घंटे तैयार रहता है, लेकिन तैनात नहीं। इतना ही नहीं, एनएसजी कमांडो जहां रोजाना 300 चक्र फायरिंग करते है, वहीं फोर्स वन कमांडों के लिए 30 चक्र फायरिंग का प्रशिक्षण ही रहा है। फोर्स वन के युद्धकौशल को देखने के बाद एनएसजी के एक अधिकारी की टिप्पणी थी कि अभी इन्हें बहुत मांजने की जरूरत है, लेकिन शुरुआत होना ही अच्छा संकेत है।

हर रोज नई चाल दिखा रहा है बाजार

यह एक खतरनाक संकेत है। उठापटक से भरपूर शेयर बाजार किसी को सहारा नहीं दे रहा है। यह बाजार न तो छोटे खुदरा निवेशकों का बाजार है और न ही रोजाना ट्रेडिंग कर कमाने खाने वाले कारोबारियों का। कारोबार में उतार-चढ़ाव इतना ज्यादा है कि कोई नहीं समझ पा रहा कि बाजार की चाल आखिर कैसी रहने वाली है। हां, इतना जरूर है कि यह बाजार एक ऐसे बुलबुले में हवा भरता दिखाई दे रहा है, जिस पर बाजार की निगरानी रखने वाली सरकारी ताकतों की नजर जाना बेहद जरूरी है।

पिछले करीब एक महीने से बाजार हर रोज नई चाल दिखा रहा है। एक दिन दो सौ अंक ऊपर जाता है तो दूसरे दिन ढाई सौ प्वाइंट गिरता भी है। उसके अगले दिन फिर डेढ़ सौ प्वाइंट ऊपर जाकर दो दिन पुराने स्तर को पा लेता है। यानी घूम फिर कर बाजार फिर वहीं लौट आता है। जिस अंदाज और जहां से बाजार में पैसा आ रहा है, उसे देखकर अगर अभी बाजार नियंत्रक नहीं चौंक रहा है तो यह सबके लिए खतरनाक हो सकता है।

बाजार की यह हालत छोटे निवेशकों के लिए बहुत ज्यादा जोखिम भरी है। पिछली मंदी में भारी भरकम नुकसान उठाने के बाद खुदरा निवेशक बमुश्किल छह महीने पहले बाजार में लौटा है। लेकिन बाजार की स्थिति डांवाडोल होने के बाद अब फिर उसने अपने हाथ खींच लिये हैं। पिछले तीन-चार महीने में ऐसे छोटे निवेशकों की भागीदारी बाजार में तेजी से कम हुई है, जो नकद सौदे करके डिलीवरी लेने में यकीन रखते हैं। यही निवेशक बाजार को लंबे समय तक आधार प्रदान करते हैं। लेकिन शेयर बाजार के ऐसे नकद कारोबार को देखें तो पता चलता है कि इस साल जून के मुकाबले अक्टूबर में रोजाना औसतन कारोबार 10 से 12 फीसदी घट गया है। यानी शेयर बाजार में डिलीवरी लेने वाले सौदे कम हो रहे हैं।

दूसरी तरफ सटोरियों की जमात बढ़ रही है। वायदा सौदों का कारोबार शेयर बाजार में बढ़ रहा है। ऐसा कारोबार पिछले चार महीने में रोजाना औसतन 69,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 75,000 करोड़ रुपये से ऊपर निकल गया है। मतलब साफ है। निवेशकों का भरोसा बाजार में कम हो रहा है। नकद में डिलीवरी लेकर सौदे करने का मतलब है कि निवेशक में लंबे समय तक बाजार में टिकना चाहता है। यह तथ्य और भी दिलचस्प तब हो जाता है जब यह दिख रहा है कि इन चार महीने में शेयर बाजार के सूचकांक की रफ्तार काफी तेज रही है। इसके बावजूद लंबी अवधि वाले खुदरा निवेशक का भरोसा बाजार में नहीं बन पा रहा है।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही हैं? या फिर भविष्य में उनके प्रदर्शन में सुधार की उम्मीद नहीं है? जी नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है। दरअसल इसकी सबसे बड़ी वजह है विदेशी संस्थागत निवेशकों [एफआईआई] की बड़े पैमाने पर शेयर बाजार में मौजूदगी। बीते साल यानी 2008 में मंदी के चलते शेयर बाजार से एफआईआई गायब हो गये थे। लेकिन वर्ष 2009 की शुरुआत से ही भारतीय अर्थव्यवस्था के सकारात्मक संकेतों से वे फिर यहां लौटे हैं। लेकिन इस बार कुछ ज्यादा तेजी के साथ।

तमाम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां मान रही हैं कि इस वक्त चीन और भारत दो अर्थव्यवस्थाएं ऐसी हैं, जो तेज रफ्तार से आगे बढ़ती दिखाई दे रही हैं। इन दोनों में भी एफआईआई रिटर्न के लिहाज से भारतीय शेयर बाजार को ज्यादा बेहतर मान रहे हैं। लिहाजा इस साल जनवरी से अब तक एफआईआई घरेलू शेयर बाजार में 15 अरब डालर झोंक चुके हैं। जाहिर है वे यह काम धर्माथ नहीं कर रहे हैं। उन्हें अपने निवेश पर मुनाफा चाहिए। लिहाजा वे खरीदो-बेचो-खरीदो की नीति पर चलते हुए बाजार में कृत्रिम उतार-चढ़ाव पैदा कर रहे हैं।

एफआईआई के निवेश में एक और पहलू भी उजागर हुआ है। और यह ज्यादा खतरनाक है। विदेशों से आने वाले इस निवेश में एक बड़ा हिस्सा पार्टिसिपेटरी नोट्स [पी नोट्स] के जरिए आया है। आइए पहले समझ लेते हैं कि पी नोट्स का निवेश क्या है? दरअसल घरेलू शेयर बाजार में वही एफआईआई निवेश कर सकते हैं जो सेबी के पास पंजीकृत होते हैं। लेकिन विदेशों में कई ऐसे बड़े निवेशक या फंड भी हैं, जो सेबी के पास पंजीकृत नहीं है। ऐसे निवेशकों के लिए बाजार नियामक ने पी नोट की सुविधा दी है। यानी सेबी के पास पंजीकृत ब्रोकर ऐसे विदेशी निवेशकों को पी नोट जारी करते हैं और वे इन ब्रोकरों के जरिए भारतीय बाजार में पैसा लगाते हैं।

सरकार भी मानती है कि पिछले दो महीने में भारत में आने वाले एफआईआई निवेश में पी नोट्स के जरिए आने वाले निवेश की हिस्सेदारी काफी बड़ी रही है। सितंबर और अक्टूबर में आए एफआईआई निवेश में तीसरा हिस्सा पी नोट्स का रहा है। सरकार ने भी माना है कि ऐसा निवेश बढ़ रहा है। अक्टूबर में यह राशि 1,24,575 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। जबकि अगस्त तक यह 1,10,355 करोड़ रुपये थी। हालांकि यह कहना काफी मुश्किल और गलत होगा कि पी नोट्स के जरिए घरेलू बाजार में आने वाला यह पूरा निवेश जोखिम भरा है। लेकिन हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि पिछले साल अक्टूबर में शेयर बाजार में जो कुछ हुआ, उसमें इस तरह के निवेश का बहुत बड़ा हाथ था।

लिहाजा यह वक्त है सचेत हो जाने का। बाजार नियंत्रक सेबी के लिए भी और छोटे व खुदरा निवेशकों के लिए भी, जो बाजार में निवेश करते हैं लंबी अवधि के अपने लक्ष्यों को पूरा करने के उद्देश्य से। हम तो यही उम्मीद करेंगे कि ऐसा कुछ न हो जिसकी आशंका हम यहां व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन कहावत है कि दवा करने से अच्छा है परहेज कर लिया जाए। इसलिए अभी ऐसे निवेश की पहचान कर उसे बाजार से अलग कर देना चाहिए जो आने वाले समय में किसी तरह की दिक्कत पैदा करे।

- नितिन प्रधान

सरकारी फाइल और मुआवजे का मरहम

अपने देश में आतंकवाद तो स्थायी मेहमान बन चुका है, लेकिन इसके शिकार हुए लोगों का मुआवजा आज भी राजनेताओं और अधिकारियों की लालफीताशाही के बीच झूलता नजर आता है। यही कारण है कि आतंकियों की गोलियों ने मरने वालों के साथ भले कोई भेद न किया हो, लेकिन मृतकों के परिजनों को मिलने वाले सरकारी मुआवजे की राशियों में यह भेद साफ नजर आता है।

मुंबई पर हुए हमले में कुल 179 लोग मारे गए थे। इनमें जो लोग सीएसटी [वीटी] रेलवे स्टेशन के अंदर मारे गए थे, उनके परिजनों को करीब 22 लाख रुपये मुआवजा मिलना निर्धारित हुआ था। लेकिन जो लोग स्टेशन के ठीक बाहर मरे थे, उनके लिए यह राशि घटकर सिर्फ आठ लाख रुपये रह गई। यहां तक कि इस घटना में मारे गए हेमंत करकरे, अशोक काम्टे और विजय सालस्कर जैसे अधिकारियों सहित अन्य सुरक्षाकर्मियों के परिजन भी दुर्भाग्यशाली ही साबित हुए। उन्हें रेल मंत्रालय एवं रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल से तो कुछ मिलना ही नहीं था, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने भी उनके साथ कंजूसी ही दिखाई गई। पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा शहीदों के परिवारों को पेट्रोल पंप देने की घोषणा भी अब तक थोथी ही नजर आ रही है।

मुआवजे का खेल

आतंकी हमले के तुरंत बाद रेलमंत्री ने प्रत्येक मृतक के परिवार के लिए 10 लाख रुपये मुआवजा घोषित किया था। रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल की ओर से मिलने वाले चार लाख रुपये इससे अलग थे। राज्य सरकार ने भी सभी मृतकों के लिए इस बार पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा घोषित किया था। इसके अतिरिक्त उड़ीसा में चर्चो पर हुए हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आतंकवाद एवं सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए लोगों के लिए तीन लाख रुपये की सहायता योजना शुरू की थी। इस प्रकार उक्त सभी स्त्रोतों को मिलाकर प्रत्येक सीएसटी रेलवे स्टेशन परिसर में मारे गए प्रत्येक मृतक के परिवार को कम से कम 22 लाख रुपये एवं सीएसटी परिसर से बाहर मारे गए लोगों के परिवारों को आठ लाख रुपये मुआवजा मिलना तय था। इसमें प्रधानमंत्री राहत कोष से मिलने वाली सहायता राशि शामिल नहीं है, जिसकी घोषणा हमले के दूसरे दिन ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुंबई आकर की थी।

कंजूस राज्य सरकार

आतंकियों के हमले में मारे गए पुलिसकर्मियों के लिए राज्य सरकार ने उदारतापूर्वक 25 लाख रुपये नकद मुआवजे की घोषणा कर दी थी। लेकिन एक दिसंबर, 2008 को जारी शासनादेश से सरकार की कंजूसी उजागर हो जाती है। जिसके अनुसार उक्त राशि मिलने के बाद किसी पुलिसकर्मी की आनड्यूटी मृत्यु पर उसे गृह विभाग से मिलने वाले 13 लाख रुपये दिया जाना उचित नहीं होगा। इस प्रकार आतंकवाद की एक ही घटना में रेलवे स्टेशन के अंदर मारे गए आमजन को 22 लाख रुपये की तुलना में स्टेशन के बाहर आतंकियों की गोली से शहीद हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों के हिस्से में महज 12 लाख रुपये ही आए।

पीएमओ का हाल

सबसे हास्यास्पद स्थिति तो सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री कार्यालय की है। 27 नवंबर, 2008 को प्रधानमंत्री द्वारा घोषित विशेष राहत राशि में घायलों एवं मृतकों को उनकी परिस्थिति के अनुसार अधिकतम दो लाख रुपये तक प्राप्त होने थे। मृतकों एवं घायलों को मिलाकर कुल 403 लोगों को यह लाभ मिलना था। आज तक सिर्फ 30 प्रतिशत लोगों को ही प्रधानमंत्री राहत कोष के चेक प्राप्त हो सके हैं। 79 के तो विवरण तक अभी राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय को नहीं भेजे हैं। इसी प्रकार केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से इस प्रकार की घटनाओं में मिलने वाली तीन लाख रुपये की राशि भी अभी 100 से कम लोगों को ही मिल सकी है।

नहीं मिले पेट्रोल पंप

पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से शहीदों के परिजनों को पेट्रोल पंप देने की घोषणा भी अब तक हवाई ही साबित हुई है। आधे से ज्यादा शहीदों को तो पेट्रोल पंप का आबंटन हुआ ही नहीं है। जिनके नाम से पेट्रोल पंप आबंटित हुए भी हैं, उनका आबंटन भी कागजी ही है। क्योंकि उन्हें पेट्रोल पंप के बजाय पेट्रोलियम कंपनी से प्रतिमाह 25 हजार रुपये नकद दिलवाने की व्यवस्था मात्र की गई है। यह भी कब तक जारी रहेगी, कुछ स्पष्ट नहीं है। ऐसे हवाई पेट्रोल पंपों के लाभार्थियों में हेमंत करकरे एवं अशोक काम्टे जैसे हाई प्रोफाइल शहीदों के परिवार भी शामिल हैं।

रिकार्ड में बनाए दरोगा ई सिपाही क्या है भाई….??

बैठ जाइए और बस हमपर छोड़ दीजिए। सिलेबस है मेरे पास और माडल पेपर तैयार है। अरे रिकार्ड में दरोगा बनाए हैं, ई सिपाही क्या चीज है। ग्यारह हजार डाउन करना होगा, बाकी हम देख लेंगे। यह है सिपाही बनाने के लिए पटना के पाश इलाके में खुली एक कोचिंग का दृश्य। बात करते-करते कोचिंग संचालक माडल पेपर भी लाकर रख देता है। आधा दर्जन छात्रों के सामने वह इतिहास से लेकर गणित तक की बात कुछ इस अंदाज में करता है कि कहीं से कोई कनफ्यूजन की गुंजाइश नहीं। विदित हो कि बिहार पुलिस में तेरह हजार सिपाहियों की भर्ती होनी है।

राज्य सरकार ने इस बार सिपाही भर्ती की व्यवस्था को पलट दिया है। पहले सिपाहियों को लिखित परीक्षा में पास होना होगा और फिर उन्हें फिटनेस टेस्ट से गुजरना होगा। सबसे दिलचस्प बात यह है कि लिखित परीक्षा में प्राप्त अंक के आधार पर ही मेधा सूची तैयार की जानी है। राजधानी के जिन इलाकों में हाल तक इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थानों की धूम थी उन इलाकों में सिपाही भर्ती की परीक्षा पास कराने वाली कोचिंग के नये-नये बोर्ड टागे जा रहे हैं। बोर्ड ऐसे कि आप एक नजर में गच्चा खा जाएं।

रिकार्ड दावे वाले बोर्ड में कुछ तस्वीरें भी डाल दी गयी हैं। इलाके और कोचिंग में स्पेस के आधार पर रेट हैं। पाँच हजार से ग्यारह हजार रुपये में पूरे सिलेबस को पढ़ा दिए जाने की गारंटी है।

यानी अगर चालीस लड़के भी आ गये तो तीन माह में दो लाख रुपये का धंधा। सिपाही भर्ती के लिए सिलेबस भर्ती बोर्ड ने जारी कर दिया है। वहा फ्रास की क्त्राति से लेकर संविधान के नीति निर्देशक तत्व और फिर हिंदी और अंग्रेजी के व्याकरण सहित मैट्रिक स्तर पर पढ़ायी जाने वाली विज्ञान के अध्याय शामिल हैं। कोचिंग सेंटर पर पहुंच रहे छात्रों से जब बात होती है तो वे कहते हैं-कहा से पचड़े में पड़ा जाए। एक साथ कई तरह के माडल पेपर उपलब्ध हो जाएंगे और साथ-साथ प्रैक्टिस भी। चलिए पाच हजार देकर देखते हैं। बात सिर्फ कोचिंग संस्थानों तक ही सीमित नहीं है।

गाइड और गेस पेपर छापने वाले प्रकाशकों ने भी इस मौके का भरपूर लाभ उठाने की तैयारी कर रखी है। बाजार सूत्रों की मानें तो दस-पंद्रह दिनों के भीतर बड़ी संख्या में सिपाही भर्ती में शर्तिया सफलता का दावा दिलाने वाले गाइड भी बाजार में उपलब्ध हो जाएंगे। कुछ जगहों पर क्रैश कोर्स की भी तैयारी है। कोचिंग संचालकों ने बताया कि उनकी योजना सिर्फ राजधानी में ही नहीं जिला स्तर पर इस तरह के कोचिंग संस्थानों को शुरू किए जाने की है। अगले माह से इस धंधे में और भी उबाल आएगा। दिसंबर तक फार्म जमा होंगे। इसके बाद परीक्षा की तारीख तय होगी।

सच्चा प्यार चाहिए या नानवेज जोक….. ड़ाल करें …..

मैं हूं एक प्यारी सी कुंवारी लड़की। आप हमसे किसी भी तरह की बात कर सकते हैं। चाहे वह..। क्या आपको चाहिए सच्चा प्यार? तो काल कीजिए .. नंबर पर। दस रुपये प्रति मिनट की दर से होगी यह काल। क्या आप बोर हो रहे हैं तो फिर ‘जोक’ है न आपके लिए। अरे! ‘नानवेज जोक’ भी है भाई।

मोबाइल कंपनियों का यह खेल आजकल जबर्दस्त तरीके से लोगों को परेशान किये है। पहले, लगातार एक नंबर से फोन आते थे। लोगों ने उसे पहचान लिया था। काल आते ही उस नंबर को उठाना ही बंद कर दिया। पर अब तो मोबाइल कंपनियों के काल सेंटर से नंबर बदल-बदल कर फोन आ रहे हैं।

दिन भर में औसतन दस से पंद्रह एसएमएस तो इस तरह के आ ही जाते हैं। कहने को तो इस पर पाबंदी है पर देश में इसकी कोई सीधी व्यवस्था नहीं कि आप इस तरह के काल की शिकायत संबंधित कंपनी के खिलाफ कर सकें या फिर इस तरह के काल आपके मोबाइल पर न आयें। समस्या इतनी बड़ी है कि हर घर का औसतन तीन से चार आदमी इस समस्या से परेशान है। मेरा ख़ुद का नम्बर NATIONAL DO NOT DISTURB REGISTRY में ragistar किया हुआ है पर फ़िर भी कॉल आ रही है !

मोबाइल कंपनियों का हाल यह है कि अब समाज के संस्कार पर भी चोट करना शुरू कर दिया है। जब काल सेंटर से संबंधित मोबाइल कंपनी द्वारा ग्रुप एसएमएस अपने ग्राहकों को किया जाता है तो उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं रहती कि वह किस उम्र के लोगों को अपना संदेश भेज रहे हैं और उसे पढ़ेगा कौन?

एक संदेश की बानगी देखिए-आप हिना से दोस्ती करना चाहते हैं तो .. नंबर पर आइए, टीना ..नंबर पर मिलेगी और फिर करीना.. नंबर पर। वृद्ध दादा जी एसएमएस नहीं पढ़ पाते हैं और अपने किशोर पोते को कहते हैं क्या है? जब वह एसएमएस अपने दादा जी को पढ़कर सुनाता है तो क्या स्थिति होगी इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।

मोबाइल कंपनियों से इस तरह के जो काल आ रहे हैं उनमें कभी-कभी बिल्कुल ही उन्मुक्त अंदाज में लड़कियां कुछ इस तरह से बात करती हैं कि मानो..। दफ्तर जाने और लौटने के समय इस तरह के काल खूब आते हैं। जैसे ही मोबाइल की घंटी बजी कि आप रुक गए। भले ही देर क्यूं न हो जाए। आपने हलो बोला तो आधे सेकेंड के बाद उधर से आवाज आती है।

लवमीटर क्या बला है इस बारे में अब तक शायद ही किसी को पता हो पर मोबाइल कंपनियां आपको यह बता रही हैं कि आप अपने नाम और अपनी चहेती के नाम एसएमएस करें। हम लवमीटर पर उसे जांचकर बता देंगे किस स्तर का है आपका प्यार?..आप दिखना चाहते हैं स्लिम एंड ट्रिम तो फिर अपना ब्लड ग्रुप हमें भेजिए हम बताएंगे आपको आपके ब्लड ग्रुप के हिसाब से वह आहार जो आपको स्लिम बना देगा।

प्यार, इश्क और नानवेज जोक के लिए निमंत्रण के साथ-साथ अब आपकी गाय आपके पड़ोसी की गाय से अधिक दूध कैसे दे इस बात की गारंटी के लिए भी एसएमएस करने को आमंत्रित किया जा रहा है !!

टी आर पी की दौड़ में हारे क्विज शो: सिद्धार्थ बासु


एक ऐसा समय था जब रविवार के दिन बच्चे टेलीविजन पर अपने क्विज शो का बेसब्री से इंतजार करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होता। विभिन्न चैनलों के बीच चल रहा टीआरपी युद्ध और दर्शकों की गीत, नृत्य और रियलिटी शो की मांग ने भारतीय टेलीविजन के पर्दे से ज्ञान-आधारित कार्यक्रमों को गायब कर दिया है। अब अभिभावक शिकायत कर रहे हैं।

दो किशोर बच्चों की मां संगीता अग्रवाल कहती हैं, पहले सास-बहु के धारावाहिक चलते थे। अब ग्रामीण परिवेश पर आधारित शो या बिग बॉस जैसे रियलिटी शो चल रहे हैं। मैं अपने बच्चों को क्या देखने दूं।

अग्रवाल कहती हैं कि पहले वह प्रत्येक रविवार को बॉर्नवीटा क्विज कांटेस्ट का इंतजार करती थीं लेकिन अब हिंसात्मक और संवेदनहीन शो उन्हें छोटे पर्दे से दूर रखते हैं।

भारत में क्विज व खेलों से संबंधित रियलिटी कार्यक्रमों के प्रस्तोताओं में से एक सिद्धार्थ बासु कहते हैं कि क्विज शो प्रसारित न होने का सबसे सामान्य कारण टीआरपी की दौड़ है।

बासु ने कहा, ज्ञान-आधारित शो और अंग्रेजी भाषा के कार्यक्रम मुश्किल से ही टीआरपी की सूची में दिखते हैं। इसलिए जब तक एक क्विज शो का प्रसारकों या विज्ञापनदाताओं के साथ गठबंधन नहीं होता तब तक ये शो विलुप्त प्रजाति के कार्यक्रम बने रहेंगे। बॉर्नवीटा क्विज कांटेस्ट, क्विज टाइम, स्पैक्ट्रम, द इंडिया क्विज, मास्टरमाइंड इंडिया, यूनीवर्सिटी चैलेंज, कौन बनेगा करोड़पति और इंडियाज चाइल्ड जीनियस जैसे कार्यक्रम पहले टेलीविजन पर प्रसारित होते थे लेकिन अब इस तरह के कार्यक्रम कहीं भी दिखाई नहीं देते।

बासु सलाह देते हैं, यदि बच्चों को ज्ञान के क्षेत्र में मूल्यों की जरूरत है, तो मैं कहूंगा कि वह टेलीविजन कम देखें या चुनिंदा कार्यक्रम ही देखें।

महारष्ट्र में मीडिया कर्मिओं पर हमले पर मैनपुरी की मीडिया ने फूंका ठाकरे का पुतला

पुतला फुकने जाते मैनपुरी के मीडिया कर्मी

ठाकरे के पुतले पर विरोध जताते मीडिया कर्मी

शिव सैनिकों की और से महाराष्ट्र में मीडिया पर किये गए हमले का मैनपुरी के मीडिया ने पुरजोर तरीके से विरोध किया.इस घटना को लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक बताते हुए शिव सैनकों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है.दैनिक जागरण.राष्ट्रीय सहारा.अमरउजाला.दैनिक हिन्दुस्तान.डीएलए और बुराभाला ब्लॉग के मीडिया कर्मियों ने बाला साहब का पुतला जला कर नारेबाजी की.इस मोके पर विरिष्ठ पत्रकार खुशीराम यादव ने शिवसैनिकों की इस हरकत की कड़े शब्दों में भर्त्सना की.दैनिक जागरण के संवादाता राकेश रागी ने मनसे और शिवसेना को प्रतिवंधित करने की मांग की.राष्ट्रिय सहारा के सिटी चीफ अगम चौहान ने कहा कि भाषा और प्रदेश के नाम पर जनभावनाओं को भडकाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाये.सत्यम चेनल ने इस घटना के विरोध में काली पट्टी बांध कर दफ्तर में काम किया.चेनल के सम्पादक हृदेश सिंह ने कहा कि देश कि जनता को भी एक जुट होकर ऐसे लोगों का विरोध करना चाहिए.बुरा भला ब्लॉग के सम्पादक शिवम् मिश्र ने भी इस घटना को गलत बताया.इस मोके पर सुबोध तिवारी.चेतन चतुर्वेदी.विशाल शर्मा.मुकेश कश्यप.नेहा सिंह.अमित उपाध्याय.कोशल यादव.पंकज चौहान.आशीष दीक्षित.प्रगति चौहान गौरव सहित कई मीडिया कर्मी मौजूद रहे.

सिर्फ 19 रुपये में पुराना नंबर रखना संभव

अगर आप एक मोबाइल कंपनी की सेवाएं छोड़ कर किसी दूसरी कंपनी का कनेक्शन लेना चाहते हैं तो आपको केवल एक मुश्त 19 रुपये खर्च करने होंगे।

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण [ट्राई] ने शुक्रवार को इस बारे में साफ निर्देश दूरसंचार कंपनियों को दे दिए। इस निर्देश के मुताबिक नंबर पोर्टबिलिटी की सुविधा लेने वाले ग्राहकों को पुराने नंबर जारी रखने के लिए 19 रुपये का भुगतान करना होगा।

महानगरों सहित ‘ए’ श्रेणी के शहरों में नंबर पोर्टबिलिटी की सुविधा 31 दिसंबर, 2009 से लागू की जाएगी। देश के अन्य हिस्सों में यह मार्च, 2010 से लागू की जानी है।

इस बारे में ट्राई की तरफ से जारी प्रावधानों के मुताबिक यह शुल्क ग्राहकों को नई सेवा प्रदाता कंपनी को देना होगा। शुल्क लगाने की मुख्य वजह यह है कि पुराने नंबर की जांच- पड़ताल नई कंपनी को अपने स्तर पर करनी होगा। इसमें वह चार दिनों का वक्त लेगी। अगर कंपनियां चाहें तो वे इस शुल्क को माफ भी कर सकती हैं।

माना जा रहा है कि मोबाइल सेवा में उतरने वाली नई कंपनियों ने नंबर पोर्टबिलिटी का फायदा उठाने की पूरी तैयारी कर ली है। चूंकि जिन शहरों में पहले चरण में यह सुविधा शुरू की जा रही है वहां पहले से ही काफी जबरदस्त प्रतिस्पद्र्धा चल रही है। पुरानी कंपनियों ने बाजार पर काफी हद तक कब्जा जमा लिया है। ऐसे में जिन कंपनियों को नया लाइसेंस मिला है वे मौजूदा कंपनियों के बाजार पर कब्जा जमाने के लिए इस सेवा का फायदा उठा सकती हैं। यह भी माना जा रहा है कि मौजूदा सेवा प्रदाता कंपनियां भी उन ग्राहकों के बाहर जाने से खुश होंगी जिनसे कोई खास कारोबार नहीं मिलता है। सनद रहे कि हाल ही में किये गये एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि 45 फीसदी उपभोक्ता मोबाइल फोन कंपनियों की सेवाओं से असंतुष्ट हैं। इससे यह भी पता चला है कि प्री पेड ग्राहक और कम इस्तेमाल करने वाले ग्राहक अपनी सेवा प्रदाता कंपनी को छोड़ने में ज्यादा आनाकानी नहीं करेंगे।